महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2165, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें‘जो श्राद्धकालमें इस अध्यायका पाठ करते हुए ब्राह्मणोंको भोजन आदिसे तृप्त करता है, उसके पितर अत्यन्त प्रसन्न होकर अमृत भोजन करते हैं ।।
यश्चेदं शृणुयाद् भक्त्या मद्गतेनान्तरात्मना ।
तस्य रात्रिकृतं सर्वं पापमाशु प्रणश्यति ।।
‘जो मुझमें चित्त लगाकर इस प्रसंगको भक्तिपूर्वक सुनता है, उसके एक रातके सारे पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं ।।
अतः परं विशेषं तु कपिलानां ब्रवीमि ते ।
यश्चैताः कपिलाः प्रोक्ता दश राजन् मया तव ।
तासां चतस्रः प्रवराः पुण्याः पापविनाशनाः ।।
‘अब मैं कपिला गौके सम्बन्धमें विशेष बातें बतला रहा हूँ। राजन्! पहले जो मैंने तुम्हें दस प्रकारकी कपिला गौएँ बतलायी हैं, उनमें चार कपिलाएँ अत्यन्त श्रेष्ठ, पुण्य प्रदान करनेवाली तथा पाप नष्ट करनेवाली हैं ।।
सुवर्णकपिला पुण्यास्तथा रक्ताक्षपिङ्गला ।
पिङ्गलाक्षी च या गौश्च स्यात् पिङ्गलपिङ्गला ।।
एताश्चतस्रः प्रवराः पवित्राः पापनाशनाः ।
नमस्कृता वा दृष्टा वा घ्नन्ति पापं नरस्य तु ।।
‘सुवर्णकपिला, रक्ताक्षपिंगला, पिंगलाक्षी और पिंगलपिंगला—ये चार प्रकारकी कपिलाएँ श्रेष्ठ, पवित्र और पाप दूर करनेवाली हैं। इनके दर्शन और नमस्कारसे भी मनुष्यके पाप नष्ट हो जाते हैं ।।
यस्यैताः कपिलाः सन्ति गृहे पापप्रणाशनाः ।
तत्र श्रीर्विजयः कीर्तिः स्फीता नित्यं युधिष्ठिर ।।
‘युधिष्ठिर! ये पापनाशिनी कपिला गौएँ जिसके घरमें मौजूद रहती हैं वहाँ श्री, विजय और विशाल कीर्तिका नित्य निवास होता है ।।
एतासां प्रीतिमायाति क्षीरेण तु वृषध्वजः ।
दध्ना च त्रिदशाः सर्वे घृतेन तु हुताशनः ।।
‘इनके दूधसे भगवान् शंकर, दहीसे सम्पूर्ण देवता और घीसे अग्निदेव तृप्त होते हैं ।।
कपिलाया घृतं क्षीरं दधि पायसमेव वा ।
श्रोत्रियेभ्यः सकृद् दत्त्वा नरः पापैः प्रमुच्यते ।।
‘कपिला गौके घी, दूध, दही अथवा खीरका एक बार भी श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको दान करके मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है ।।
उपवासं तु यः कृत्वाप्यहोरात्रं जितेन्द्रियः ।
कपिलापञ्चगव्यं तु पीत्वा चान्द्रायणात् परम् ।।