महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2166, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें'जो जितेन्द्रिय रहकर एक दिन-रात उपवास करके कपिला गौका पञ्चगव्य पान करता है, उसे चान्द्रायणसे बढ़कर उत्तम फलकी प्राप्ति होती है॥ सौम्ये मुहूर्ते तत् प्राश्य शुद्धात्मा शुद्धमानसः। क्रोधानृतविनिर्मुक्तो मद्गतेनान्तरात्मना॥ 'जो क्रोध और असत्यका त्याग करके मुझमें चित्त लगाकर शुभ मुहूर्तमें कपिला गौके पंचगव्यका आचमन करता है, उसका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है॥ कपिलापञ्चगव्येन समन्त्रेण पृथक् पृथक्। यो मत्प्रतिकृतिं वापि शङ्कराकृतिमेव वा। स्नापयेद् विषुवे यस्तु सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥ 'जो विषुवयोगमें पृथक्-पृथक् मन्त्र पढ़कर कपिलाके पञ्चगव्यसे मेरी या शंकरकी प्रतिमाको स्नान कराता है, उसे अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है॥ स मुक्तपापः शुद्धात्मा यानेनाम्बरशोभिना। मम लोकं व्रजेन्मुक्तो रुद्रलोकमथापि वा॥ 'वह मुक्त, निष्पाप एवं शुद्धचित्त होकर आकाशकी शोभा बढ़ानेवाले विमानके द्वारा मेरे अथवा रुद्रके लोकमें गमन करता है॥ तस्मात् तु कपिला देया परत्र हितमिच्छता॥ यदा च दीयते राजन् कपिला ह्यग्निहोत्रिणे। तदा च शृङ्गयोस्तस्या विष्णुरिन्द्रश्च तिष्ठतः। 'राजन्! इसलिये परलोकमें हित चाहनेवाले पुरुषको कपिला गौका दान अवश्य करना चाहिये। जिस समय अग्निहोत्री ब्राह्मणको कपिला गौ दानमें दी जाती है, उस समय उसके सींगोंके ऊपरी भागमें विष्णु और इन्द्र निवास करते हैं॥ चन्द्रवज्रधरौ चापि तिष्ठतः शृङ्गमूलयोः। शृङ्गमध्ये तथा ब्रह्मा ललाटे गोर्वृषध्वजः॥ 'सींगोंकी जड़में चन्द्रमा और वज्रधारी इन्द्र रहते हैं। सींगोंके बीचमें ब्रह्मा तथा ललाटमें भगवान् शंकरका निवास होता है॥' कर्णयोरश्विनौ देवौ चक्षुषी शशिभास्करौ। दन्तेषु मरुतो देवा जिह्वायां वाक् सरस्वती॥ रोमकूपेषु मुनयश्चर्मण्येव प्रजापतिः। निःश्वासेषु स्थिता वेदाः सषडङ्गपदक्रमाः॥ 'दोनों कानोंमें अश्विनीकुमार, नेत्रोंमें चन्द्रमा और सूर्य, दाँतोंमें मरुद्गण, जिह्वामें सरस्वती, रोमकूपोंमें मुनि, चमड़ेमें प्रजापति एवं श्वासोंमें षडंग, पद और क्रमसहित चारों वेदोंका निवास है॥ नासापुटे स्थिता गन्धाः पुष्पाणि सुरभीणि च।