भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2164, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2164

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[कपिला गौमें देवताओंके निवासस्थानका तथा उसके माहात्म्यका, अयोग्य ब्राह्मणका, नरकमें ले जानेवाले पापोंका तथा स्वर्गमें ले जानेवाले पुण्योंका वर्णन]

वैशम्पायन उवाच

एवं श्रुत्वा परं पुण्यं कपिलादानमुत्तमम् ।
धर्मपुत्रः प्रहृष्टात्मा केशवं पुनरब्रवीत् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार परम पुण्यमय कपिला गौके उत्तम दानका वर्णन सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरका मन बहुत प्रसन्न हुआ और उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णसे पुनः इस प्रकार प्रश्न किया— ।।
देवदेवेश कपिला यदा विप्राय दीयते ।
कथं सर्वेषु चाङ्गेषु तस्यास्तिष्ठन्ति देवताः ॥
‘देवदेवेश्वर! जो कपिला गौ ब्राह्मणको दानमें दी जाती है, उसके सम्पूर्ण अंगोंमें देवता किस प्रकार रहते हैं? ।।
याश्चैताः कपिलाः प्रोक्ता दश चैव त्वया मम ।
तासां कति सुरश्रेष्ठ कपिलाः पुण्यलक्षणाः ॥
‘सुरश्रेष्ठ! आपने जो दस प्रकारकी कपिला गौएँ बतलायी हैं, उनमेंसे कितनी कपिलाएँ पुण्यमयी मानी जाती हैं’? ।।
युधिष्ठिरेणैवमुक्तः केशवः सत्यवाक् तदा ।
गुह्यानां परमं गुह्यं प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥
शृणु राजन् पवित्रं वै रहस्यं धर्ममुत्तमम् ॥
युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर उस समय सत्यवादी भगवान् श्रीकृष्ण गोपनीयसे भी अत्यन्त गोपनीय कथा कहने लगे—‘राजन्! मैं परम पवित्र, गोपनीय एवं उत्तम धर्मका वर्णन करता हूँ, सुनो ।।
इदं पठति यः पुण्यं कपिलादानमुत्तमम् ।
प्रातरुत्थाय मद्भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु ॥
‘जो मनुष्य सबेरे उठकर मुझमें भक्ति रखते हुए इस परम पुण्यमय उत्तम कपिला-दानके माहात्म्यका पाठ करता है, उसके पुण्यका फल सुनो ।।
मनसा कर्मणा वाचा मतिपूर्वं युधिष्ठिर ।
पापं रात्रिकृतं हन्यादस्याध्यायस्य पाठकः ॥
‘युधिष्ठिर! इस अध्यायका पाठ करनेवाला मनुष्य रात्रिमें मन, वाणी अथवा क्रियाद्वारा जान-बूझकर किये हुए सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ।।
इदमावर्तमानस्तु श्राद्धे यस्तर्पयेद् द्विजान् ।
तस्याप्यमृतमश्नन्ति पितरोऽत्यन्तहर्षिताः ॥