महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2213, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें[सर्वहितकारी धर्मका वर्णन, द्वादशी-व्रतका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके द्वारा भगवान्की स्तुति]
युधिष्ठिर उवाच
सर्वभूतपते श्रीमन् सर्वभूतनमस्कृत ।
सर्वभूतहितं धर्मं सर्वज्ञ कथयस्व नः ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**भगवान्! आप सब प्राणियोंके स्वामी, सबके द्वारा नमस्कृत, शोभासम्पन्न और सर्वज्ञ हैं। अब आप मुझसे समस्त प्राणियोंके लिये हितकारी धर्मका वर्णन कीजिये।।
श्रीभगवानुवाच
यद् दरिद्रजनस्यापि स्वर्ग्यं सुखकरं भवेत् ।
सर्वपापप्रशमनं तच्छृणुष्व युधिष्ठिर ॥
**श्रीभगवान् बोले—**युधिष्ठिर! जो धर्म दरिद्र मनुष्योंको भी स्वर्ग और सुख प्रदान करनेवाला तथा समस्त पापोंका नाश करनेवाला है, उसका वर्णन करता हूँ, सुनो।।
एकभक्तेन वर्तेत नरः संवत्सरं तु यः ।
ब्रह्मचारी जितक्रोधो ह्यधःशायी जितेन्द्रियः ॥
शुचिश्च स्नातो ह्यव्यग्रः सत्यवागनसूयकः ।
अर्चन्नेव तु मां नित्यं मद्गतेनान्तरात्मना ।
संध्ययोस्तु जपेन्नित्यं मद्गायत्रीं समाहितः ॥
नमो ब्रह्मण्यदेवायत्यसकृन्मां प्रणम्य च ।
विप्रमग्रासने कृत्वा यावकं भैक्षमेव वा ॥
भुक्त्वा तु वाग्यतो भूमावाचान्तस्य द्विजन्मनः ।
नमोऽस्तु वासुदेवायत्युक्त्वा तु चरणौ स्पृशेत् ॥
मासे मासे समाप्ते तु भोजयित्वा द्विजान् शुचीन् ।
संवत्सरे ततः पूर्णे दद्यात् तु व्रतदक्षिणाम् ॥
नवनीतमयीं गां वा तिलधेनुमथापि वा ।
विप्रहस्तच्युतैस्तोयैः सहिरण्यैः समुक्षितः ।
तस्य पुण्यफलं राजन् कथ्यमानं मया शृणु ॥
राजन्! जो मनुष्य एक वर्षतक प्रतिदिन एक समय भोजन करता है, ब्रह्मचारी रहता है, क्रोधको काबूमें रखता है, नीचे सोता है और इन्द्रियोंको वशमें रखता है, जो स्नान करके पवित्र रहता है, व्यग्र नहीं होता है, सत्य बोलता है, किसीके दोष नहीं देखता है और मुझमें चित्त लगाकर सदा मेरी पूजामें ही संलग्न रहता है, जो दोनों संध्याओंके समय एकाग्रचित्त होकर मुझसे सम्बन्ध रखनेवाली गायत्रीका जप करता है, ‘नमो ब्रह्मण्यदेवाय’* कहकर