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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2214, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2214

सदा मुझे प्रणाम किया करता है, पहले ब्राह्मणको भोजनके आसनपर बिठाकर भोजन करानेके पश्चात् स्वयं मौन होकर जौकी लप्सी अथवा भिक्षान्नका भोजन करता है तथा 'नमोऽस्तु वासुदेवाय' कहकर ब्राह्मणके चरणोंमें प्रणाम करता है; जो प्रत्येक मास समाप्त होनेपर पवित्र ब्राह्मणोंको भोजन कराता है और एक सालतक इस नियमका पालन करके ब्राह्मणको इस व्रतकी दक्षिणाके रूपमें माखन अथवा तिलकी गौ दान करता है तथा ब्राह्मणके हाथसे सुवर्णयुक्त जल लेकर अपने शरीरपर छिड़कता है, उसके पुण्यका फल बतलाता हूँ, सुनो ।।

दशजन्मकृतं पापं ज्ञानतोऽज्ञानतोऽपि वा ।
तद् विनश्यति तस्याशु नात्र कार्या विचारणा ।।
उसके जान-बूझकर या अनजानमें किये हुए दस जन्मोंतकके पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं—इसमें तनिक भी अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ।।

युधिष्ठिर उवाच

सर्वेषामुपवासानां यच्छ्रेयः सुमहत्फलम् ।
यच्च निःश्रेयसं लोके तद् भवान् वक्तुमर्हति ।।
युधिष्ठिरने कहा— भगवन्! सब प्रकारके उपवासोंमें जो सबसे श्रेष्ठ, महान् फल देनेवाला और कल्याणका सर्वोत्तम साधन हो, उसका वर्णन करनेकी कृपा कीजिये ।।

श्रीभगवानुवाच

शृणु राजन् मया पूर्वं यथा गीतं तु नारदे ।
तथा ते कथयिष्यामि मद्भक्ताय युधिष्ठिर ।।
श्रीभगवान् बोले— महाराज युधिष्ठिर! तुम मेरे भक्त हो। जैसे पूर्वमें मैंने नारदसे कहा था, वैसे ही तुम्हें बतलाता हूँ, सुनो ।।

यस्तु भक्त्या शुचिर्भूत्वा पञ्चम्यां मे नराधिप ।
उपवासव्रतं कुर्यात् त्रिकालं चार्चयंस्तु माम् ।
सर्वक्रतुफलं लब्ध्वा मम लोके महीयते ।।
नरेश! जो पुरुष स्नान आदिसे पवित्र होकर मेरी पञ्चमीके दिन भक्तिपूर्वक उपवास करता है तथा तीनों समय मेरी पूजामें संलग्न रहता है, वह सम्पूर्ण यज्ञोंका फल पाकर मेरे परम धाममें प्रतिष्ठित होता है ।।

पर्वद्वयं च द्वादश्यौ श्रवणं च नराधिप ।
मत्पञ्चमीति विख्याता मत्प्रिया च विशेषतः ।।
नरेश्वर! अमावास्या और पूर्णिमा—ये दोनों पर्व, दोनों पक्षकी द्वादशी तथा श्रवण-नक्षत्र—ये पाँच तिथियाँ मेरी पञ्चमी कहलाती हैं। ये मुझे विशेष प्रिय हैं ।।

तस्मात् तु ब्राह्मणश्रेष्ठैर्मन्निवेशितबुद्धिभिः ।

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