भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2215, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2215

उपवासस्तु कर्तव्यो मत्प्रीयार्थं विशेषतः ।। अतः श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उचित है कि वे मेरा विशेष प्रिय करनेके लिये मुझमें चित्त लगाकर इन तिथियोंमें उपवास करें ।।

द्वादश्यामेव वा कुर्यादुपवासमशक्नुवन् ।
तेनाहं परमां प्रीतिं यास्यामि नरपुङ्गव ।।
नरश्रेष्ठ! जो सबमें उपवास न कर सके, वह केवल द्वादशीको ही उपवास करे; इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता होती है ।।

अहोरात्रेण द्वादश्यां मार्गशीर्षेण केशवम् ।
उपोष्य पूजयेद् यो मां सोऽश्वमेधफलं लभेत् ।।
जो मार्गशीर्षकी द्वादशीको दिन-रात उपवास करके 'केशव' नामसे मेरी पूजा करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है ।।

द्वादश्यां पुष्यमासे तु नाम्ना नारायणं तु माम् ।
उपोष्य पूजयेद् यो मां वाजिमेधफलं लभेत् ।।
जो पौष मासकी द्वादशीको उपवास करके 'नारायण' नामसे मेरी पूजा करता है, वह वाजिमेध-यज्ञका फल पाता है ।।

द्वादश्यां माघमासे तु मामुपोष्य तु माधवम् ।
पूजयेद् यः समाप्नोति राजसूयफलं नृप ।।
राजन्! जो माघकी द्वादशीको उपवास करके 'माधव' नामसे मेरा पूजन करता है, उसे राजसूय-यज्ञका फल प्राप्त होता है ।।

द्वादश्यां फाल्गुने मासि गोविन्दाख्यमुपोष्य माम् ।
पूजयेद् यः समाप्नोति ह्यतिरात्रफलं नृप ।।
नरेश्वर! फाल्गुनके महीनेमें द्वादशीको उपवास करके जो 'गोविन्द' के नामसे मेरा अर्चन करता है, उसे अतिरात्र यागका फल मिलता है ।।

द्वादश्यां मासि चैत्रे तु मां विष्णुं समुपोष्य यः ।
पूजयंस्तदवाप्नोति पौण्डरीकस्य यत् फलम् ।।
चैत्र महीनेकी द्वादशी तिथिको व्रत धारण करके जो 'विष्णु' नामसे मेरी पूजा करता है, वह पुण्डरीक-यज्ञके फलका भागी होता है ।।

द्वादश्यां मासि वैशाखे मधुसूदनसंज्ञितम् ।
उपोष्य पूजयेद् यो मां सोऽग्निष्टोमस्य पाण्डव ।।
पाण्डुनन्दन! वैशाखकी द्वादशीको उपवास करके 'मधुसूदन' नामसे मेरी पूजा करनेवालेको अग्निष्टोम-यज्ञका फल मिलता है ।।

द्वादश्यां ज्येष्ठमासे तु मामुपोष्य त्रिविक्रमम् ।
अर्चयेद् यः समाप्नोति गवां मेधफलं नृप ।।