भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2216, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2216

राजन्! जो मनुष्य ज्येष्ठमासकी द्वादशी तिथिको उपवास करके 'त्रिविक्रम' नामसे मेरी पूजा करता है, वह गोमेधके फलका भागी होता है ।। आषाढे वामनाख्यं मां द्वादश्यां समुपोष्य यः । नरमेधस्य स फलं प्राप्नोति भरतर्षभ ।। भरतश्रेष्ठ! आषाढ़मासकी द्वादशीको व्रत रहकर 'वामन' नामसे मेरी पूजा करनेवाले पुरुषको नरमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है ।। द्वादश्यां श्रावणे मासि श्रीधराख्यमुपोष्य माम् । पूजयेद् यः समाप्नोति पञ्चयज्ञफलं नृप ।। राजन्! श्रावण महीनेमें द्वादशी तिथिको उपवास करके जो 'श्रीधर' नामसे मेरा पूजन करता है, वह पञ्चयज्ञोंका फल पाता है ।। मासे भाद्रपदे यो मां हृषीकेशाख्यमर्चयेत् । उपोष्य स समाप्नोति सौत्रामणिफलं नृप ।। नरेश्वर! भाद्रपदमासकी द्वादशी तिथिको उपवास करके 'हृषीकेश' नामसे मेरा अर्चन करनेवालेको सौत्रामणि-यज्ञका फल मिलता है ।। द्वादश्यामाश्वयुङ्मासे पद्मनाभमुपोष्य माम् । अचेयेद् यः समाप्नोति गोसहस्रफलं नृप ।। महाराज! आश्विनकी द्वादशीको उपवास करके जो 'पद्मनाभ' नामसे मेरा अर्चन करता है, उसे एक हजार गोदानका फल प्राप्त होता है ।। द्वादश्यां कार्तिके मासि मां दामोदरसंज्ञितम् । उपोष्य पूजयेद् यस्तु सर्वक्रतुफलं नृप ।। राजन्! कार्तिक महीनेकी द्वादशी तिथिको व्रत रहकर जो 'दामोदर' नामसे मेरी पूजा करता है, उसको सम्पूर्ण यज्ञोंका फल मिलता है ।। केवलेनोपवासेन द्वादश्यां पाण्डुनन्दन । यत् फलं पूर्वमुद्दिष्टं तस्यार्धं लभते नृप ।। नरपते! जो द्वादशीको केवल उपवास ही करता है, उसे पूर्वोक्त फलका आधा भाग ही प्राप्त होता है ।। श्रावणेऽप्येवमेवं मामर्चयेद् भक्तिमान् नरः । मम सालोक्यमाप्नोति नाज कार्या विचारणा ।। इसी प्रकार श्रावणमें भी यदि मनुष्य भक्तियुक्त चित्तसे मेरी पूजा करता है तो वह मेरी सालोक्य मुक्तिको प्राप्त होता है, इसमें तनिक भी अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ।। मासे मासे समभ्यर्च्य क्रमशो मामतन्द्रितः । पूर्णे संवत्सरे कुर्यात् पुनः संवत्सरं तु माम् ।।