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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2217, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2217

उपर्युक्तरूपसे प्रतिमास आलस्य छोड़कर मेरी पूजा करते-करते जब एक साल पूरा हो जाय, तब पुनः दूसरे साल भी मासिक पूजन प्रारम्भ कर दे ।।

एवं द्वादशवर्षं यो मद्भक्तो मत्परायणः ।
अविघ्नमर्चयानस्तु मम सायुज्यमाप्नुयात् ।।
इस प्रकार जो मेरा भक्त मेरी आराधनामें तत्पर होकर बारह वर्षतक बिना किसी विघ्न-बाधाके मेरी पूजा करता रहता है, वह मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है ।।

अर्चयेत् प्रीतिमान् यो मां द्वादश्यां वेदसंहिताम् ।
स पूर्वोक्तफलं राजँल्लभते नात्र संशयः ।।
राजन्! जो मनुष्य द्वादशी तिथिको प्रेमपूर्वक मेरी और वेदसंहिताकी पूजा करता है, उसे पूर्वोक्त फलोंकी प्राप्ति होती है, इसमें संशय नहीं है ।।

गन्धं पुष्पं फलं तोयं पत्रं वा मूलमेव वा ।
द्वादश्यां मम यो दद्यात् तत्समो नास्ति मत्प्रियः ।।
जो द्वादशी तिथिको मेरे लिये चन्दन, पुष्प, फल, जल, पत्र अथवा मूल अर्पण करता है उसके समान मेरा प्रिय भक्त कोई नहीं है ।।

एतेन विधिना सर्वे देवाः शक्रपुरोगमाः ।
मद्भक्ता नरशार्दूल स्वर्गलोकं तु भुञ्जते ।।
नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर! इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता उपर्युक्त विधिसे मेरा भजन करनेके कारण ही आज स्वर्गीय सुखका उपभोग कर रहे हैं ।।

वैशम्पायन उवाच

एवं वदति देवेशे केशवे पाण्डुनन्दनः ।
कृताञ्जलिः स्तोत्रमिदं भक्त्या धर्मात्मजोऽब्रवीत् ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णके इस प्रकार उपदेश देनेपर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर हाथ जोड़कर भक्तिपूर्वक उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे— ।।

सर्वलोकेश देवेश हृषीकेश नमोऽस्तु ते ।
सहस्रशिरसे नित्यं सहस्राक्ष नमोऽस्तु ते ।।
‘हृषीकेश! आप सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी और देवताओंके भी ईश्वर हैं। आपको नमस्कार है। हजारों नेत्र धारण करनेवाले परमेश्वर! आपके सहस्रों मस्तक हैं, आपको सदा प्रणाम है ।।

त्रयीमय त्रयीनाथ त्रयीस्तुत नमो नमः ।
यज्ञात्मन् यज्ञसम्भूत यज्ञनाथ नमो नमः ।।
‘वेदत्रयी आपका स्वरूप है, तीनों वेदोंके आप अधीश्वर हैं और वेदत्रयीके द्वारा आपकी ही स्तुति की गयी है। आप ही यज्ञस्वरूप, यज्ञमें प्रकट होनेवाले और यज्ञके स्वामी

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