भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2219, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2219

उन्हें रोका ।। निवार्य च पुनर्वाचा भक्तिनम्रं युधिष्ठिरम् ।
वक्तुमेव नरश्रेष्ठ धर्मपुत्रं प्रचक्रमे ।।
नरोत्तम! भगवान् श्रीकृष्ण पुनः वाणीद्वारा निवारण करके भक्तिसे विनम्र हुए धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे यों कहने लगे ।।

श्रीभगवानुवाच
अन्यवत् किमिदं राजन् मां स्तौषि नरपुङ्गव ।
तिष्ठ पृच्छ यथापूर्वं धर्मपुत्र युधिष्ठिर ।।
**श्रीभगवान् बोले—**राजन्! यह क्या है? तुम भेद-भाव रखनेवाले मनुष्यकी भाँति मेरी स्तुति क्यों करने लगे? पुरुषप्रवर धर्मपुत्र युधिष्ठिर! इसे बंद करके पहलेके ही समान प्रश्न करो ।।

युधिष्ठिर उवाच
इदं च धर्मसम्पन्नं वक्तुमर्हसि मानद ।
कृष्णपक्षेषु द्वादश्यामर्चनीयः कथं भवेत् ।।
**युधिष्ठिरने पूछा—**मानद! कृष्णपक्षमें द्वादशीको आपकी पूजा किस प्रकार करनी चाहिये? इस धर्मयुक्त विषयका वर्णन कीजिये ।।

श्रीभगवानुवाच
शृणु राजन् यथा पूर्वं तत् सर्वं कथयामि ते ।
परमं कृष्णद्वादश्यामर्चनायां फलं मम ।।
**श्रीभगवान्‌ने कहा—**राजन्! मैं पूर्ववत् तुम्हारे सभी प्रश्नोंका उत्तर देता हूँ, सुनो। कृष्णपक्षकी द्वादशीको मेरी पूजा करनेका बहुत बड़ा फल है ।।
एकादश्यामुपोष्यथ द्वादश्यामर्चयेत् तु माम् ।
विप्रानपि यथालाभं पूजयेद् भक्तिमान् नरः ।।
एकादशीको उपवास करके द्वादशीको मेरा पूजन करना चाहिये। उस दिन भक्तियुक्त मनुष्यको यथाशक्ति ब्राह्मणोंका भी पूजन करना चाहिये ।।
स गच्छेद् दक्षिणामूर्तिं मां वा नात्र विचारणा ।
चन्द्रसालोक्यमथवा ग्रहनक्षत्रपूजितः ।।
ऐसा करनेसे मनुष्य दक्षिणामूर्ति शिवको अथवा मुझे प्राप्त होता है; इसमें कोई संशय नहीं है। अथवा वह ग्रह-नक्षत्रोंसे पूजित हुआ चन्द्रमाके लोकको प्राप्त हो जाता है ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)