महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2235, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुधिष्ठिर! तप, दया, शील, थोड़ेमें संतोष करना—ये सद्गुण भी तीर्थरूपमें ही हैं तथा पतिव्रता नारी भी तीर्थ है ।।
संतुष्टो ब्राह्मणस्तीर्थं ज्ञानं वा तीर्थमुच्यते ।
मद्भक्ताः सततं तीर्थं शङ्करस्य विशेषतः ।।
संतोषी ब्राह्मण और ज्ञानको भी तीर्थ कहते हैं। मेरे भक्त सदैव तीर्थरूप हैं और शंकरके भक्त विशेषतया तीर्थ हैं ।।
यतयस्तीर्थमित्येवं विद्वांसस्तीर्थमुच्यते ।
शरण्यपुरुषस्तीर्थमभयं तीर्थमुच्यते ।।
संन्यासी और विद्वान् भी तीर्थ कहे जाते हैं। दूसरोंको शरण देनेवाले पुरुष भी तीर्थ हैं। जीवोंको अभय दान देना भी तीर्थ ही कहलाता है ।।
त्रैलोक्येऽस्मिन् निरुद्विग्नो न बिभेमि कुतश्चन ।
न दिवा यदि वा रात्रावुद्वेगः शूद्रलङ्घनात् ।।
मैं तीनों लोकोंमें उद्वेगशून्य हूँ। दिन हो या रात, मुझे कभी किसीसे भी भय नहीं होता; किंतु शूद्रका मर्यादा-भंग करना मुझे बुरा लगता है ।।
न भयं देवदैत्येभ्यो रक्षोभ्यश्चैव मे नृप ।
शूद्रवक्त्राच्च्युतं ब्रह्म भयं तु मम सर्वदा ।।
राजन्! देवता, दैत्य और राक्षसोंसे भी मैं नहीं डरता। परंतु शूद्रके मुखसे जो वेदका उच्चारण होता है, उससे मुझे सदा ही भय बना रहता है ।।
तस्मात् सप्रणवं शूद्रो मन्नामापि न कीर्तयेत् ।
प्रणवं हि परं लोके ब्रह्म ब्रह्मविदो विदुः ।।
इसलिये शूद्रको मेरे नामका भी प्रणवके साथ उच्चारण नहीं करना चाहिये, क्योंकि वेदवेत्ता विद्वान् इस संसारमें प्रणवको सर्वोत्कृष्ट वेद मानते हैं ।।
द्विजशुश्रूषणं धर्मः शूद्राणां भक्तितो मयि ।
शूद्र मुझमें भक्ति रखते हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंकी सेवा करे—यही उनका परम धर्म है ।।
द्विजशुश्रूषया शूद्रः परं श्रेयोऽधिगच्छति ।
द्विजशुश्रूषणादन्यन्नास्ति शूद्रस्य निष्कृतिः ।।
द्विजोंकी सेवासे ही शूद्र परम कल्याणके भागी होते हैं। इसके सिवा उनके उद्धारका दूसरा कोई उपाय नहीं है ।।
सृष्ट्वा पितामहः शूद्रमभिभूतं तु तामसैः ।
द्विजशुश्रूषणं धर्मं शूद्राणां तु प्रयुक्तवान् ।
नश्यन्ति तामसा भावाः शूद्रस्य द्विजभक्तितः ।।