भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2236, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2236

ब्रह्माजीने शूद्रोंको तामस गुणोंसे युक्त उत्पन्न करके उनके लिये द्विजोंकी सेवारूप धर्मका उपदेश किया। द्विजोंकी भक्तिसे शूद्रके तामस भाव नष्ट हो जाते हैं।।

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतं मूर्ध्ना गृह्णामि शूद्रतः ।।
शूद्र भी यदि भक्तिपूर्वक मुझे पत्र, पुष्प, फल अथवा जल अर्पण करता है तो मैं उसके भक्तिपूर्वक दिये हुए उपहारको सादर शीश चढ़ाता हूँ ।।

अग्रजो वापि यः कश्चित् सर्वपापसमन्वितः ।
यदि मां सततं ध्यायेत् सर्वपापैः प्रमुच्यते ।।
सम्पूर्ण पापोंसे युक्त होनेपर भी यदि कोई ब्राह्मण सदा मेरा ध्यान करता रहता है तो वह अपने सम्पूर्ण पापोंसे छुटकारा पा जाता है ।।

विद्याविनयसम्पन्ना ब्राह्मणा वेदपारगाः ।
मयि भक्तिं न कुर्वन्ति चाण्डालसदृशा हि ते ।।
विद्या और विनयसे सम्पन्न तथा वेदोंके पारंगत विद्वान् होनेपर भी जो ब्राह्मण मुझमें भक्ति नहीं करते, वे चाण्डालके समान हैं ।।

वृथा दानं वृथा तप्तं वृथा चेष्टं वृथा हुतम् ।
वृथाऽऽतिथ्यं च तत् तस्य यो न भक्तो मम द्विजः ।।
जो द्विज मेरा भक्त नहीं है, उसके दान, तप, यज्ञ, होम और अतिथि-सत्कार—ये सब व्यर्थ हैं ।।

स्थावरे जङ्गमे वापि सर्वभूतेषु पाण्डव ।
समत्वेन यदा कुर्यान्मद्भक्तो मित्रशत्रुषु ।।
पाण्डुनन्दन! जब मनुष्य समस्त स्थावर-जंगम प्राणियोंमें एवं मित्र और शत्रुमें समान दृष्टि कर लेता है, उस समय वह मेरा सच्चा भक्त होता है ।।

आनृशंस्यमहिंसा च यथा सत्यं तथाऽऽर्जवम् ।
अद्रोहश्चैव भूतानां मद्गतानां व्रतं नृप ।।
राजन्! क्रूरताका अभाव, अहिंसा, सत्य, सरलता तथा किसी भी प्राणीसे द्रोह न करना—यह मेरे भक्तोंका व्रत है ।।

नम इत्येव यो ब्रूयान्मद्भक्तं श्रद्धयान्वितः ।
तस्याक्षयाऽभवँल्लोकाः श्वपाकस्यापि पार्थिव ।।
पृथ्वीनाथ! जो मनुष्य मेरे भक्तको श्रद्धापूर्वक नमस्कार करता है, वह चाण्डाल ही क्यों न हो, उसे अक्षय लोकोंकी प्राप्ति होती है ।।

किं पुनर्ये यजन्ते मां सदारं विधिपूर्वकम् ।
मद्भक्ता मद्गतप्राणाः कथयन्तश्च मां सदा ।।