भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2237, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2237

फिर जो साक्षात् मेरे भक्त हैं, जिनके प्राण मुझमें ही लगे रहते हैं तथा जो सदा मेरे ही नाम और गुणोंका कीर्तन करते रहते हैं, वे यदि लक्ष्मीसहित मेरी विधिवत् पूजा करते हैं तो उनकी सद्गतिके विषयमें क्या कहना है? ।।

बहुवर्षसहस्राणि तपस्तपति यो नरः ।
नासौ पदमवाप्नोति मद्भक्तैर्यदवाप्यते ।।
अनेकों हजार वर्षोंतक तपस्या करनेवाला मनुष्य भी उस पदको प्राप्त नहीं होता, जो मेरे भक्तोंको अनायास ही मिल जाता है ।।

मामेव तस्माद् राजेन्द्र ध्यायन् नित्यमतन्द्रितः ।
अवाप्स्यसि ततः सिद्धिं द्रक्ष्यत्येव परं पदम् ।।
इसलिये राजेन्द्र! तुम सदा सजग रहकर निरन्तर मेरा ही ध्यान करते रहो, इससे तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी और तुम निश्चय ही परम पदका साक्षात्कार कर सकोगे ।।

ऋग्वेदेनैव होता च यजुषाध्वर्युरेव च ।
सामवेदेन चोद्गाता पुण्येनाभिष्टुवन्ति माम् ।।
अथर्वशिरसा चैव नित्यमाथर्वणा द्विजाः ।
स्तुवन्ति सततं ये मां ते वै भागवताः स्मृताः ।।
जो होता बनकर ऋग्वेदके द्वारा, अध्वर्यु होकर यजुर्वेदके द्वारा, उद्गाता बनकर परम पवित्र सामवेदके द्वारा मेरा स्तवन करते हैं तथा अथर्ववेदीय द्विजोंके रूपमें जो अथर्ववेदके द्वारा हमेशा मेरी स्तुति किया करते हैं, वे भगवद्भक्त माने गये हैं ।।

वेदाधीनाः सदा यज्ञा यज्ञाधीनास्तु देवताः ।
देवताः ब्राह्मणाधीनास्तस्माद् विप्रास्तु देवताः ।।
यज्ञ सदा वेदोंके अधीन हैं और देवता यज्ञों तथा ब्राह्मणोंके अधीन होते हैं, इसलिये ब्राह्मण देवता हैं ।।

अनाश्रित्योच्छ्रयं नास्ति मुख्यमाश्रयमाश्रयेत् ।
रुद्रं समाश्रिता देवा रुद्रो ब्रह्माणमाश्रितः ।।
किसीका सहारा लिये बिना कोई ऊँचे नहीं चढ़ सकता, अतः सबको किसी प्रधान आश्रयका सहारा लेना चाहिये। देवतालोग भगवान् रुद्रके आश्रयमें रहते हैं, रुद्र ब्रह्माजीके आश्रित हैं ।।

ब्रह्मा मामाश्रितो राजन् नाहं कंचिदुपाश्रितः ।
ममाश्रयो न कश्चित् तु सर्वेषामाश्रयो ह्यहम् ।।
ब्रह्माजी मेरे आश्रयमें रहते हैं, किंतु मैं किसीके आश्रित नहीं हूँ। राजन्! मेरा आश्रय कोई नहीं है। मैं ही सबका आश्रय हूँ ।।

एवमेतन्मया प्रोक्तं रहस्यमिदमुत्तमम् ।
धर्मप्रियस्य ते नित्यं राजन्नेवं समाचर ।।