महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजन्! इस प्रकार ये उत्तम रहस्यकी बातें मैंने तुम्हें बतायी हैं, क्योंकि तुम धर्मके प्रेमी हो। अब तुम इस उपदेशके ही अनुसार सदा आचरण करो॥ इदं पवित्रमाख्यानं पुण्यं वेदेन सम्मितम्। यः पठेन्मामकं धर्ममहन्यहनि पाण्डव॥ धर्मोऽपि वर्धते तस्य बुद्धिश्चापि प्रसीदति। पापक्षयमुपेत्यैव कल्याणं च विवर्धते॥ यह पवित्र आख्यान पुण्यदायक एवं वेदके समान मान्य है। पाण्डुनन्दन! जो मेरे बताये हुए इस वैष्णव-धर्मका प्रतिदिन पाठ करेगा, उसके धर्मकी वृद्धि होगी और बुद्धि निर्मल। साथ ही उसके समस्त पापोंका नाश होकर परम कल्याणका विस्तार होगा॥ एतत् पुण्यं पवित्रं च पापनाशनमुत्तमम्। श्रोतव्यं श्रद्धया युक्तैः श्रोत्रियैश्च विशेषतः॥ यह प्रसंग परम पवित्र, पुण्यदायक, पापनाशक और अत्यन्त उत्कृष्ट है। सभी मनुष्योंको, विशेषतः श्रोत्रिय विद्वानोंको श्रद्धाके साथ इसका श्रवण करना चाहिये॥ श्रावयेद् यस्त्विदं भक्त्या प्रयतोऽथ शृणोति वा। स गच्छेन्मम सायुज्यं नात्र कार्या विचारणा॥ जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसे सुनाता और पवित्रचित्त होकर सुनता है, वह मेरे सायुज्यको प्राप्त होता है, इसमें कोई शंका नहीं है॥ यश्चेमं श्रावयेच्छाद्धे मद्भक्तो मत्परायणः। पितरस्तस्य तृप्यन्ति यावदाभूतसम्प्लवम्॥ मेरी भक्तिमें तत्पर रहनेवाला जो भक्त पुरुष श्राद्धमें इस धर्मको सुनाता है, उसके पितर इस ब्रह्माण्डके प्रलय होनेतक सदा तृप्त बने रहते हैं॥
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा भागवतान् धर्मान् साक्षाद् विष्णोर्जगद्गुरोः। प्रहृष्टमनसो भूत्वा चिन्तयन्तोऽद्भुताः कथाः॥ ऋषयः पाण्डवाश्चैव प्रणेमुस्तं जनार्दनम्। पूजयामास गोविन्दं धर्मपुत्रः पुनः पुनः॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! साक्षात् विष्णुस्वरूप जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्णके मुखसे भागवत-धर्मोंका श्रवण करके इस अद्भुत प्रसंगपर विचार करते हुए ऋषि और पाण्डवलोग बहुत प्रसन्न हुए और सबने भगवान्को प्रणाम किया। धर्मनन्दन युधिष्ठिरने तो बारंबार गोविन्दका पूजन किया॥ देवा ब्रह्मर्षयः सिद्धा गन्धर्वाप्सरसस्तथा। ऋषयश्च महात्मानो गुह्यका भुजगास्तथा॥