महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2239, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालखिल्या महात्मानो योगिनस्तत्त्वदर्शिनः । तथा भगवताश्चापि पञ्चकालमुपासकाः ।। कौतूहलसमायुक्ता भगवद्भक्तिमागताः । श्रुत्वा तु परमं पुण्यं वैष्णवं धर्मशासनम् ।। विमुक्तपापाः पूतास्ते संवृत्तास्तत्क्षणेन तु । देवता, ब्रह्मर्षि, सिद्ध, गन्धर्व, अप्सराएँ, ऋषि, महात्मा, गुह्यक, सर्प, महात्मा बालखिल्य, तत्त्वदर्शी योगी तथा पञ्चयाम उपासना करनेवाले भगवद्भक्त पुरुष, जो अत्यन्त उत्कण्ठित होकर उपदेश सुननेके लिये पधारे थे, इस परम पवित्र वैष्णव-धर्मका उपदेश सुनकर तत्क्षण निष्पाप एवं पवित्र हो गये। सबमें भगवद्भक्ति उमड़ आयी ।। प्रणम्य शिरसा विष्णुं प्रतिनन्द्य च ताः कथाः ।। फिर उन सबने भगवान्के चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और उनके उपदेशकी प्रशंसा की ।। द्रष्टारो द्वारकायां वै वयं सर्वे जगद्गुरुम् । इति प्रहृष्टमनसो ययुर्देवगणैः सह । सर्वे ऋषिगणा राजन् ययुः स्वं स्वं निवेशनम् ।। फिर ‘भगवन्! अब हम द्वारकामें पुनः आप जगद्गुरुका दर्शन करेंगे।’ यों कहकर सब ऋषि प्रसन्नचित्त हो देवताओंके साथ अपने-अपने स्थानको चले गये ।। गतेषु तेषु सर्वेषु केशवः केशिहा हरिः । सस्मार दारुकं राजन् स च सात्यकिना सह । समीपस्थोऽभवत् सूतो याहि देवेति चाब्रवीत् ।। राजन्! उन सबके चले जानेपर केशिनिषूदन भगवान् श्रीकृष्णने सात्यकिसहित दारुकको याद किया। सारथि दारुक पास ही बैठा था, उसने निवेदन किया—‘भगवन्! रथ तैयार है, पधारिये ।।' ततो विषण्णवदनाः पाण्डवाः पुरुषोत्तमम् । अञ्जलिं मूर्ध्नि संधाय नेत्रैरश्रुपरिप्लुतैः । पिबन्तः सततं कृष्णां नोचुरार्ततरास्तदा ।। यह सुनकर पाण्डवोंका मुँह उदास हो गया। उन्होंने हाथ जोड़कर सिरसे लगाया और वे आँसूभरे नेत्रोंसे पुरुषोत्तम श्रीकृष्णकी ओर एकटक देखने लगे, किंतु अत्यन्त दुखी होनेके कारण उस समय कुछ बोल न सके ।। कृष्णोऽपि भगवान् देवः पृथामामन्त्र्य चार्तवत् । धृतराष्ट्रं च गान्धारीं विदुरं द्रौपदीं तथा ।। कृष्णद्वैपायनं व्यासमृषीनन्यांश्च मन्त्रिणः । सुभद्रामात्मजयुतामुत्तरां स्पृश्य पाणिना ।