भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2240, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2240

निर्गत्य वेश्मनस्तस्मादारुरोह तदा रथम् ॥ देवेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण भी उनकी दशा देखकर दुखी-से हो गये और उन्होंने कुन्ती, धृतराष्ट्र, गान्धारी, विदुर, द्रौपदी, महर्षि व्यास और अन्यान्य ऋषियों एवं मन्त्रियोंसे बिदा लेकर सुभद्रा तथा पुत्रसहित उत्तराकी पीठपर हाथ फेरा और आशीर्वाद देकर वे उस राजभवनसे बाहर निकल आये और रथपर सवार हो गये ॥

वाजिभिः शैब्यसुग्रीवमेघपुष्पबलाहकैः । युक्तं तु ध्वजभूतेन पतगेन्द्रेण धीमता ॥ उस रथमें शैब्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक नामवाले चार घोड़े जुते हुए थे तथा बुद्धिमान् गरुड़का ध्वज फहरा रहा था ॥

अन्वारुरोह चाप्येनं प्रेम्णा राजा युधिष्ठिरः । अपास्य चाशु यन्तारं दारुकं सूतसत्तमम् । अभीषून् प्रतिजग्राह स्वयं कुरुपतिस्तदा ॥ उस समय कुरुदेशके राजा युधिष्ठिर भी प्रेमवश भगवान्‌के पीछे-पीछे स्वयं भी रथपर जा बैठे और तुरंत ही श्रेष्ठ दारुकको सारथिके स्थानसे हटाकर उन्होंने घोड़ोंकी बागडोर अपने हाथमें ले ली ॥

उपारुह्यार्जुनश्चापि चामरव्यजनं शुभम् । रुक्मदण्डं बृहन्मूर्ध्नि दुधावाभिप्रदक्षिणम् ॥ फिर अर्जुन भी रथपर आरूढ़ हो स्वर्णदण्डयुक्त विशाल चँवर हाथमें लेकर दाहिनी ओरसे भगवान्‌के मस्तकपर हवा करने लगे ॥

तथैव भीमसेनोऽपि रथमारुह्य वीर्यवान् । छत्रं शतशलाकं च दिव्यमाल्योपशोभितम् ॥ इसी प्रकार महाबली भीमसेन भी रथपर जा चढ़े और भगवान्‌के ऊपर छत्र लगाये खड़े हो गये। वह छत्र सौ कमानियोंसे युक्त तथा दिव्य मालाओंसे सुशोभित था ॥