महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2256, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंविदुर, भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, महात्मा भगवान् व्यास, संजय और गान्धारी देवीने भी मुझे पग-पगपर उचित सलाह दी, किंतु मैंने किसीकी बात नहीं मानी। यह भूल मुझे सदा संताप देती रहती है।। २० १/२ ।।
यच्चाहं पाण्डुपुत्रेषु गुणवत्सु महात्मसु ।। २१ ।।
न दत्तवान् श्रियं दीप्तां पितृपैतामहीमिमाम् ।
महात्मा पाण्डव गुणवान् हैं तथापि उनके बाप-दादोंकी यह उज्ज्वल सम्पत्ति भी मैंने उन्हें नहीं दी ।।
विनाशं पश्यमानो हि सर्वराज्ञां गदाग्रजः ।। २२ ।।
एतच्छ्रेयस्तु परमममन्यत जनार्दनः ।
समस्त राजाओंका विनाश देखते हुए गदाग्रज भगवान् श्रीकृष्णने यही परम कल्याणकारी माना कि मैं पाण्डवोंका राज्य उन्हें लौटा दूँ; परंतु मैं वैसा नहीं कर सका ।। २२ १/२ ।।
सोऽहमेतान्यलीकानि निवृत्तान्यात्मनस्तदा ।। २३ ।।
हृदये शल्यभूतानि धारयामि सहस्रशः ।
इस तरह अपनी की हुई हजारों भूलें मैं अपने हृदयमें धारण करता हूँ, जो इस समय काँटोंके समान कसक पैदा करती हैं ।। २३ १/२ ।।
विशेषतस्तु पश्यामि वर्षे पञ्चदशेऽद्य वै ।। २४ ।।
अस्य पापस्य शुद्ध्यर्थं नियतोऽस्मि सुदुर्मतिः ।
विशेषतः पंद्रहवें वर्षमें आज मुझ दुर्बुद्धिकी आँखें खुली हैं और अब मैं इस पापकी शुद्धिके लिये नियमका पालन करने लगा हूँ ।। २४ १/२ ।।
चतुर्थे नियते काले कदाचिदपि चाष्टमे ।। २५ ।।
तृष्णाविनयनं भुञ्जे गान्धारी वेद तन्मम ।
करोत्याहारमिति मां सर्वः परिजनः सदा ।। २६ ।।
कभी चौथे समय (अर्थात् दो दिनपर) और कभी आठवें समय अर्थात् चार दिनपर केवल भूखकी आग बुझानेके लिये मैं थोड़ा-सा आहार करता हूँ। मेरे इस नियमको केवल गान्धारी देवी जानती हैं। अन्य सब लोगोंको यही मालूम है कि मैं प्रतिदिन पूरा भोजन करता हूँ ।। २५-२६ ।।
युधिष्ठिरभयादेति भृशं तप्यति पाण्डवः ।
भूमौ शये जप्यपरो दर्भेष्वजिनसंवृतः ।। २७ ।।
नियमव्यपदेशेन गान्धारी च यशस्विनी ।