महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2255, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्वेताश्वो वाथ कुन्ती वा द्रौपदी वा यशस्विनी ।
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरको इस बातकी जानकारी नहीं थी। अर्जुन, कुन्ती तथा यशस्विनी द्रौपदीको भी इसका पता नहीं था ।। १३ १/२ ।।
माद्रीपुत्रौ च धर्मज्ञौ चित्तं तस्यान्ववर्तताम् ।। १४ ।।
राज्ञस्तु चित्तं रक्षन्तौ नोचतुः किंचिदप्रियम् ।
धर्मके ज्ञाता माद्रीपुत्र नकुल-सहदेव सदा राजा धृतराष्ट्रके मनोऽनुकूल ही बर्ताव करते थे। वे उनका मन रखते हुए कभी कोई अप्रिय बात नहीं कहते थे ।।
ततः समानयामास धृतराष्ट्रः सुहृज्जनम् ।। १५ ।।
वाष्पसंदिग्धमत्यर्थमिदमाह च तान् भृशम् ।
तदनन्तर धृतराष्ट्रने अपने मित्रोंको बुलवाया और नेत्रोंमें आँसू भरकर अत्यन्त गद्गद वाणीमें इस प्रकार कहा ।। १५ १/२ ।।
धृतराष्ट्र उवाच
विदितं भवतामेतद् यथा वृत्तं कुरुक्षयः ।। १६ ।।
ममापराधात् तत् सर्वमनुज्ञातं च कौरवैः ।
**धृतराष्ट्र बोले—**मित्रो! आपलोगोंको यह मालूम ही है कि कौरववंशका विनाश किस प्रकार हुआ है। समस्त कौरव इस बातको जानते हैं कि मेरे ही अपराधसे सारा अनर्थ हुआ है ।। १६ १/२ ।।
योऽहं दुष्टमतिं मन्दो ज्ञातीनां भयवर्धनम् ।। १७ ।।
दुर्योधनं कौरवाणामाधिपत्येऽभ्यषेचयम् ।
दुर्योधनकी बुद्धिमें दुष्टता भरी थी। वह जाति-भाइयोंका भय बढ़ानेवाला था तो भी मुझ मूर्खने उसे कौरवोंके राजसिंहासनपर अभिषिक्त कर दिया ।। १७ १/२ ।।
यच्चाहं वासुदेवस्य नाश्रौषं वाक्यमर्थवत् ।। १८ ।।
वध्यतां साध्ययं पापः सामात्य इति दुर्मतिः ।
पुत्रस्नेहाभिभूतस्तु हितमुक्तो मनीषिभिः ।। १९ ।।
मैंने वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णकी अर्थभरी बातें नहीं सुनी। मनीषी पुरुषोंने मुझे यह हितकी बात बतायी थी कि इस खोटी बुद्धिवाले पापी दुर्योधनको मन्त्रियोंसहित मार डाला जाय, इसीमें संसारका हित है; किंतु पुत्रस्नेहके वशीभूत होकर मैंने ऐसा नहीं किया ।।
विदुरेणाथ भीष्मेण द्रोणेन च कृपेण च ।
पदे पदे भगवता व्यासेन च महात्मना ।। २० ।।
संजयेनाथ गान्धार्या तदिदं तप्यते च माम् ।