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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

श्वेताश्वो वाथ कुन्ती वा द्रौपदी वा यशस्विनी ।
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरको इस बातकी जानकारी नहीं थी। अर्जुन, कुन्ती तथा यशस्विनी द्रौपदीको भी इसका पता नहीं था ।। १३ १/२ ।।
माद्रीपुत्रौ च धर्मज्ञौ चित्तं तस्यान्ववर्तताम् ।। १४ ।।
राज्ञस्तु चित्तं रक्षन्तौ नोचतुः किंचिदप्रियम् ।
धर्मके ज्ञाता माद्रीपुत्र नकुल-सहदेव सदा राजा धृतराष्ट्रके मनोऽनुकूल ही बर्ताव करते थे। वे उनका मन रखते हुए कभी कोई अप्रिय बात नहीं कहते थे ।।
ततः समानयामास धृतराष्ट्रः सुहृज्जनम् ।। १५ ।।
वाष्पसंदिग्धमत्यर्थमिदमाह च तान् भृशम् ।
तदनन्तर धृतराष्ट्रने अपने मित्रोंको बुलवाया और नेत्रोंमें आँसू भरकर अत्यन्त गद्गद वाणीमें इस प्रकार कहा ।। १५ १/२ ।।

धृतराष्ट्र उवाच

विदितं भवतामेतद् यथा वृत्तं कुरुक्षयः ।। १६ ।।
ममापराधात् तत् सर्वमनुज्ञातं च कौरवैः ।
**धृतराष्ट्र बोले—**मित्रो! आपलोगोंको यह मालूम ही है कि कौरववंशका विनाश किस प्रकार हुआ है। समस्त कौरव इस बातको जानते हैं कि मेरे ही अपराधसे सारा अनर्थ हुआ है ।। १६ १/२ ।।
योऽहं दुष्टमतिं मन्दो ज्ञातीनां भयवर्धनम् ।। १७ ।।
दुर्योधनं कौरवाणामाधिपत्येऽभ्यषेचयम् ।
दुर्योधनकी बुद्धिमें दुष्टता भरी थी। वह जाति-भाइयोंका भय बढ़ानेवाला था तो भी मुझ मूर्खने उसे कौरवोंके राजसिंहासनपर अभिषिक्त कर दिया ।। १७ १/२ ।।
यच्चाहं वासुदेवस्य नाश्रौषं वाक्यमर्थवत् ।। १८ ।।
वध्यतां साध्ययं पापः सामात्य इति दुर्मतिः ।
पुत्रस्नेहाभिभूतस्तु हितमुक्तो मनीषिभिः ।। १९ ।।
मैंने वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णकी अर्थभरी बातें नहीं सुनी। मनीषी पुरुषोंने मुझे यह हितकी बात बतायी थी कि इस खोटी बुद्धिवाले पापी दुर्योधनको मन्त्रियोंसहित मार डाला जाय, इसीमें संसारका हित है; किंतु पुत्रस्नेहके वशीभूत होकर मैंने ऐसा नहीं किया ।।
विदुरेणाथ भीष्मेण द्रोणेन च कृपेण च ।
पदे पदे भगवता व्यासेन च महात्मना ।। २० ।।
संजयेनाथ गान्धार्या तदिदं तप्यते च माम् ।

विदुर, भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, महात्मा भगवान् व्यास, संजय और गान्धारी देवीने भी मुझे पग-पगपर उचित सलाह दी, किंतु मैंने किसीकी बात नहीं मानी। यह भूल मुझे सदा संताप देती रहती है।। २० १/२ ।।

यच्चाहं पाण्डुपुत्रेषु गुणवत्सु महात्मसु ।। २१ ।।
न दत्तवान् श्रियं दीप्तां पितृपैतामहीमिमाम् ।
महात्मा पाण्डव गुणवान् हैं तथापि उनके बाप-दादोंकी यह उज्ज्वल सम्पत्ति भी मैंने उन्हें नहीं दी ।।

विनाशं पश्यमानो हि सर्वराज्ञां गदाग्रजः ।। २२ ।।
एतच्छ्रेयस्तु परमममन्यत जनार्दनः ।
समस्त राजाओंका विनाश देखते हुए गदाग्रज भगवान् श्रीकृष्णने यही परम कल्याणकारी माना कि मैं पाण्डवोंका राज्य उन्हें लौटा दूँ; परंतु मैं वैसा नहीं कर सका ।। २२ १/२ ।।

सोऽहमेतान्यलीकानि निवृत्तान्यात्मनस्तदा ।। २३ ।।
हृदये शल्यभूतानि धारयामि सहस्रशः ।
इस तरह अपनी की हुई हजारों भूलें मैं अपने हृदयमें धारण करता हूँ, जो इस समय काँटोंके समान कसक पैदा करती हैं ।। २३ १/२ ।।

विशेषतस्तु पश्यामि वर्षे पञ्चदशेऽद्य वै ।। २४ ।।
अस्य पापस्य शुद्ध्यर्थं नियतोऽस्मि सुदुर्मतिः ।
विशेषतः पंद्रहवें वर्षमें आज मुझ दुर्बुद्धिकी आँखें खुली हैं और अब मैं इस पापकी शुद्धिके लिये नियमका पालन करने लगा हूँ ।। २४ १/२ ।।

चतुर्थे नियते काले कदाचिदपि चाष्टमे ।। २५ ।।
तृष्णाविनयनं भुञ्जे गान्धारी वेद तन्मम ।
करोत्याहारमिति मां सर्वः परिजनः सदा ।। २६ ।।
कभी चौथे समय (अर्थात् दो दिनपर) और कभी आठवें समय अर्थात् चार दिनपर केवल भूखकी आग बुझानेके लिये मैं थोड़ा-सा आहार करता हूँ। मेरे इस नियमको केवल गान्धारी देवी जानती हैं। अन्य सब लोगोंको यही मालूम है कि मैं प्रतिदिन पूरा भोजन करता हूँ ।। २५-२६ ।।

युधिष्ठिरभयादेति भृशं तप्यति पाण्डवः ।
भूमौ शये जप्यपरो दर्भेष्वजिनसंवृतः ।। २७ ।।
नियमव्यपदेशेन गान्धारी च यशस्विनी ।

लोग युधिष्ठिरके भयसे मेरे पास आते हैं। पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर मुझे आराम देनेके लिये अत्यन्त चिन्तित रहते हैं। मैं और यशस्विनी गान्धारी दोनों नियम-पालनके व्याजसे मृगचर्म पहन कुशासनपर बैठकर मन्त्रजप करते और भूमिपर सोते हैं ।। २७ १/२ ।। हतं शतं तु पुत्राणां ययोर्युद्धेऽपलायिनाम् ॥ २८ ॥ नानुतप्यामि तच्चाहं क्षत्रधर्मं हि ते विदुः । हम दोनोंके युद्धमें पीठ न दिखानेवाले सौ पुत्र मारे गये हैं, किंतु उनके लिये मुझे दुःख नहीं है; क्योंकि वे क्षत्रिय-धर्मको जानते थे (और उसीके अनुसार उन्होंने युद्धमें प्राण-त्याग किया है) ।। २८ १/२ ।। इत्युक्त्वा धर्मराजानमभ्यभाषत कौरवः ॥ २९ ॥ भद्रं ते यादवीमातर्वचश्चेदं निबोध मे । अपने सुहृदोंसे ऐसा कहकर धृतराष्ट्र राजा युधिष्ठिरसे बोले—'कुन्तीनन्दन! तुम्हारा कल्याण हो। तुम मेरी यह बात सुनो ।। २९ १/२ ।। सुखमस्म्युषितः पुत्र त्वया सुपरिपालितः ॥ ३० ॥ महादानानि दत्तानि श्राद्धानि च पुनः पुनः । 'बेटा! तुम्हारे द्वारा सुरक्षित होकर मैं यहाँ बड़े सुखसे रहा हूँ। मैंने बड़े-बड़े दान दिये हैं और बारंबार श्राद्धकर्मोंका अनुष्ठान किया है ।। ३० १/२ ।। प्रकृष्टं च यया पुत्र पुण्यं चीर्णं यथाबलम् ॥ ३१ ॥ गान्धारी हतपुत्रेयं धैर्येणोदीक्षते च माम् । 'पुत्र! जिसने अपनी शक्तिके अनुसार उत्कृष्ट पुण्यका अनुष्ठान किया है और जिसके सौ पुत्र मारे गये हैं, वही यह गान्धारीदेवी धैर्यपूर्वक मेरी देख-भाल करती है ।। ३१ १/२ ।। द्रौपद्या ह्यपकर्तारस्तव चैश्वर्यहारिणः ॥ ३२ ॥ समतीता नृशंसास्ते स्वधर्मेण हता युधि । न तेषु प्रतिकर्तव्यं पश्यामि कुरुनन्दन ॥ ३३ ॥ 'कुरुनन्दन! जिन्होंने द्रौपदीके साथ अत्याचार किया, तुम्हारे ऐश्वर्यका अपहरण किया, वे क्रूरकर्मी मेरे पुत्र क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्धमें मारे गये हैं। अब उनके लिये कुछ करनेकी आवश्यकता नहीं दिखायी देती है ।। ३२-३३ ।। सर्वे शस्त्रभृतां लोकान् गतास्तेऽभिमुखं हताः । आत्मनस्तु हितं पुण्यं प्रतिकर्तव्यमद्य वै ॥ ३४ ॥ गान्धार्याश्चैव राजेन्द्र तदनुज्ञातुमर्हसि । 'वे सब युद्धमें सम्मुख मारे गये हैं, अतः शस्त्रधारियोंको मिलनेवाले लोकोंमें गये हैं। राजेन्द्र! अब तो मुझे और गान्धारीदेवीको अपने हितके लिये पवित्र तप करना है; अतः इसके लिये हमें अनुमति दो ।। ३४ १/२ ।।

त्वं तु शस्त्रभृतां श्रेष्ठः सततं धर्मवत्सलः ।। ३५ ।। राजा गुरुः प्राणभृतां तस्मादेतद् ब्रवीम्यहम् । अनुज्ञातस्त्वया वीर संश्रयेयं वनान्यहम् ।। ३६ ।। ‘तुम शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ और सदा धर्मपर अनुराग रखनेवाले हो। राजा समस्त प्राणियोंके लिये गुरुजनकी भाँति आदरणीय होता है। इसलिये तुमसे ऐसा अनुरोध करता हूँ। वीर! तुम्हारी अनुमति मिल जानेपर मैं वनको चला जाऊँगा ।। ३५-३६ ।। चीरवल्कलभृद् राजन् गान्धार्या सहितोऽनया । तवाशिषः प्रयुञ्जानो भविष्यामि वनेचरः ।। ३७ ।। ‘राजन्! वहाँ मैं चीर और वल्कल धारण करके इस गान्धारीके साथ वनमें विचरूँगा और तुम्हें आशीर्वाद देता रहूँगा ।। ३७ ।। उचितं नः कुले तात सर्वेषां भरतर्षभ । पुत्रेष्वैश्वर्यमाधाय वयसोऽन्ते वनं नृप ।। ३८ ।। ‘तात! भरतश्रेष्ठ नरेश्वर! हमारे कुलके सभी राजाओंके लिये यही उचित है कि वे अन्तिम अवस्थामें पुत्रोंको राज्य देकर स्वयं वनमें पधारें ।। ३८ ।। तत्राहं वायुभक्षो वा निराहारोऽपि वा वसन् । पत्न्या सहानया वीर चरिष्यामि तपः परम् ।। ३९ ।। ‘वीर! वहाँ मैं वायु पीकर अथवा उपवास करके रहूँगा तथा अपनी इस धर्मपत्नीके साथ उत्तम तपस्या करूँगा ।। ३९ ।। त्वं चापि फलभाक् तात तपसः पार्थिवो ह्यसि । फलभाजो हि राजानः कल्याणस्येतरस्य वा ।। ४० ।। ‘बेटा! तुम भी उस तपस्याके उत्तम फलके भागी बनोगे; क्योंकि तुम राजा हो और राजा अपने राज्यके भीतर होनेवाले भले-बुरे सभी कर्मोंके फलभागी होते हैं’ ।। ४० ।। युधिष्ठिर उवाच न मां प्रीणयते राज्यं त्वय्येवं दुःखिते नृप । धिङ्मामस्तु सुदुर्बुद्धिं राज्यसक्तं प्रमादिनम् ।। ४१ ।। युधिष्ठिरने कहा—महाराज! आप यहाँ रहकर इस प्रकार दुःख उठा रहे थे और मुझे इसकी जानकारी न हो सकी, इसलिये अब यह राज्य मुझे प्रसन्न नहीं रख सकता। हाय! मेरी बुद्धि कितनी खराब है? मुझ-जैसे प्रमादी और राज्यासक्त पुरुषको धिक्कार है ।। ४१ ।। योऽहं भवन्तं दुःखार्तमुपवासकृशं भृशम् । जिताहारं क्षितिशयं न विन्दे भ्रातृभिः सह ।। ४२ ।।

आप दुःखसे आतुर और उपवास करनेके कारण अत्यन्त दुर्बल होकर पृथ्वीपर शयन

कर रहे हैं तथा भोजनपर भी संयम कर लिया है और मैं भाइयोंसहित आपकी इस

अवस्थाका पता ही न पा सका ।। ४२ ।।

अहोऽस्मि वञ्चितो मूढो भवता गूढबुद्धिना ।

विश्वासयित्वा पूर्वं मां यदिदं दुःखमश्रुथाः ।। ४३ ।।

अहो! आपने अपने विचारोंको छिपाकर मुझ मूर्खको अबतक धोखेमें ही डाल रखा

था; क्योंकि पहले मुझे यह विश्वास दिलाकर कि मैं सुखी हूँ, आप आजतक यह दुःख

भोगते रहे ।। ४३ ।।

किं मे राज्येन भोगैर्वा किं यज्ञैः किं सुखेन वा ।

यस्य मे त्वं महीपाल दुःखान्येतान्यवाप्तवान् ।। ४४ ।।

महाराज! इस राज्यसे, इन भोगोंसे, इन यज्ञोंसे अथवा इस सुख-सामग्रीसे मुझे क्या

लाभ हुआ? जब कि मेरे ही पास रहकर आपको इतने दुःख उठाने पड़े ।।

पीडितं चापि जानामि राज्यमात्मानमेव च ।

अनेन वचसा तुभ्यं दुःखितस्य जनेश्वर ।। ४५ ।।

जनेश्वर! आप दुःखी होकर जो ऐसी बात कह रहे हैं, इससे मैं उस समस्त राज्यको

और अपनेको भी दुःखित समझता हूँ ।। ४५ ।।

भवान् पिता भवान् माता भवान् नः परमो गुरुः ।

भवता विप्रहीणा वै क्व नु तिष्ठामहे वयम् ।। ४६ ।।

आप ही हमारे पिता, आप ही माता और आप ही हमारे परम गुरु हैं। आपसे विलग

होकर हम कहाँ रहेंगे ।। ४६ ।।

औरसो भवतः पुत्रो युयुत्सुर्नृपसत्तम ।

अस्तु राजा महाराज यमन्यं मन्यते भवान् ।। ४७ ।।

अहं वनं गमिष्यामि भवान् राज्यं प्रशासतु ।

न मामयशसा दग्धं भूयस्त्वं दग्धुमर्हसि ।। ४८ ।।

नृपश्रेष्ठ! महाराज! युयुत्सु आपके औरस पुत्र हैं; ये ही राजा हों अथवा और किसीको

जिसे आप उचित समझते हों, राजा बना दें या स्वयं ही इस राज्यका शासन करें। मैं ही

वनको चला जाऊँगा। पिताजी! मैं पहलेसे ही अपयशकी आगमें जल चुका हूँ, अब पुनः

आप भी मुझे न जलाइये ।। ४७-४८ ।।

नाहं राजा भवान् राजा भवतः परवानहम् ।

कथं गुरुं त्वां धर्मज्ञमनुज्ञातुमिहोत्सहे ।। ४९ ।।

मैं राजा नहीं, आप ही राजा हैं। मैं तो आपकी आज्ञाके अधीन रहनेवाला सेवक हूँ।

आप धर्मके ज्ञाता गुरु हैं। मैं आपको कैसे आज्ञा दे सकता हूँ ।। ४९ ।।

न मन्युर्हृदि नः कश्चित् सुयोधनकृतेऽनघ ।

भवितव्यं तथा तद्धि वयं चान्ये च मोहिताः ॥ ५० ॥ निष्पाप नरेश! दुर्योधनने जो कुछ किया है, उसके लिये हमारे हृदयमें तनिक भी क्रोध नहीं है। जो कुछ हुआ है, वैसी ही होनहार थी। हम और दूसरे लोग उसीसे मोहित थे ॥ ५० ॥

वयं पुत्रा हि भवतो यथा दुर्योधनादयः ।
गान्धारी चैव कुन्ती च निर्विशेषे मते मम ॥ ५१ ॥
जैसे दुर्योधन आदि आपके पुत्र थे, वैसे ही हम भी हैं। मेरे लिये गान्धारी और कुन्तीमें कोई अन्तर नहीं है ॥ ५१ ॥

स मां त्वं यदि राजेन्द्र परित्यज्य गमिष्यसि ।
पृष्ठतस्त्वनुयास्यामि सत्यमात्मानमालभे ॥ ५२ ॥
राजन्! यदि आप मुझे छोड़कर चले जायँगे तो मैं अपनी सौगन्ध खाकर सत्य कहता हूँ कि मैं भी आपके पीछे-पीछे चल दूँगा ॥ ५२ ॥

इयं हि वसुसम्पूर्णा मही सागरमेखला ।
भवता विप्रहीणस्य न मे प्रीतिकरी भवेत् ॥ ५३ ॥
आपके त्याग देनेपर यह धन-धान्यसे परिपूर्ण समुद्रसे घिरी हुई सारी पृथ्वीका राज्य भी मुझे प्रसन्न नहीं रख सकता ॥ ५३ ॥

भवदीयमिदं सर्वं शिरसा त्वां प्रसादये ।
त्वदधीनाः स्म राजेन्द्र व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥ ५४ ॥
राजेन्द्र! यह सब कुछ आपका है। मैं आपके चरणोंपर मस्तक रखकर प्रार्थना करता हूँ कि आप प्रसन्न हो जाइये। हम सब लोग आपके अधीन हैं। आपकी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ॥ ५४ ॥

भवितव्यमनुप्राप्तो मन्ये त्वं वसुधाधिप ।
दिष्ट्या शुश्रूषमाणस्त्वां मोक्षिष्ये मनसो ज्वरम् ॥ ५५ ॥
पृथ्वीनाथ! मैं समझता हूँ कि आप भवितव्यताके वशमें पड़ गये थे। यदि सौभाग्यवश मुझे आपकी सेवाका अवसर मिलता रहा तो मेरी मानसिक चिन्ता दूर हो जायगी ॥ ५५ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

तापस्ये मे मनस्तात वर्तते कुरुनन्दन ।
उचितं च कुलेऽस्माकमरण्यगमनं प्रभो ॥ ५६ ॥
धृतराष्ट्र बोले—बेटा! कुरुनन्दन! अब मेरा मन तपस्यामें ही लग रहा है। प्रभो! जीवनकी अन्तिम अवस्थामें वनको जाना हमारे कुलके लिये उचित भी है ॥ ५६ ॥

चिरमस्म्युषितः पुत्र चिरं शुश्रूषितस्त्वया ।
वृद्धं मामप्यनुज्ञातुमर्हसि त्वं नराधिप ॥ ५७ ॥

पुत्र! नरेश्वर! मैं दीर्घकालतक तुम्हारे पास रह चुका और तुमने भी बहुत दिनोंतक मेरी सेवा-शुश्रूषा की। अब मेरी वृद्धावस्था आ गयी। अब तो मुझे वनमें जानेकी अनुमति देनी ही चाहिये ॥ ५७ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्त्वा धर्मराजानं वेपमानं कृताञ्जलिम् ।
उवाच वचनं राजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ॥ ५८ ॥
संजयं च महात्मानं कृपं चापि महारथम् ।
अनुनेतुमिहेच्छामि भवद्भिर्वसुधाधिपम् ॥ ५९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! धृतराष्ट्रकी यह बात सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर काँपने लगे और हाथ जोड़कर चुपचाप बैठे रहे। अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने उनसे उपर्युक्त बात कहकर महात्मा संजय और महारथी कृपाचार्यसे कहा—'मैं आपलोगोंके द्वारा राजा युधिष्ठिरको समझाना चाहता हूँ' ॥ ५८–५९ ॥
म्लायते मे मनो हीदं मुखं च परिशुष्यति ।
वयसा च प्रकृष्टेन वाग्व्यायामेन चैव ह ॥ ६० ॥
'एक तो मेरी वृद्धावस्था और दूसरे बोलनेका परिश्रम, इन कारणोंसे मेरा जी घबरा रहा है और मुँह सूखा जाता है' ॥ ६० ॥
इत्युक्त्वा स तु धर्मात्मा वृद्धो राजा कुरूद्वहः ।
गान्धारीं शिश्रिये धीमान् सहसैव गतासुवत् ॥ ६१ ॥
ऐसा कहकर धर्मात्मा बूढ़े राजा कुरुकुलशिरोमणि बुद्धिमान् धृतराष्ट्रने सहसा ही निर्जीवकी भाँति गान्धारीका सहारा ले लिया ॥ ६१ ॥

तं तु दृष्ट्वा समासीनं विसंज्ञमिव कौरवम् । आर्तिं राजागमत् तीव्रां कौन्तेयः परवीरहा ॥ ६२ ॥ कुरुराज धृतराष्ट्रको संज्ञाहीन-सा बैठा देख शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले कुन्तीकुमार राजा युधिष्ठिरको बड़ा दुःख हुआ ॥ ६२ ॥

युधिष्ठिर उवाच यस्य नागसहस्रेण शतसंख्येन वै बलम् । सोऽयं नारीं व्यपाश्रित्य शेते राजा गतासुवत् ॥ ६३ ॥ **युधिष्ठिरने कहा—**ओह! जिसमें एक लाख हाथियोंके समान बल था, वे ही ये राजा धृतराष्ट्र आज प्राणहीन-से होकर स्त्रीका सहारा लिये सो रहे हैं ॥ ६३ ॥ आयसी प्रतिमा येन भीमसेनस्य सा पुरा । चूर्णीकृता बलवता सोऽबलामाश्रितः स्त्रियम् ॥ ६४ ॥ जिन बलवान् नरेशने पहले भीमसेनकी लोहमयी प्रतिमाको चूर्ण कर डाला था, वे आज अबला नारीके सहारे पड़े हैं ॥ ६४ ॥ धिगस्तु मामधर्मज्ञं धिग् बुद्धिं धिक् च मे श्रुतम् । यत्कृते पृथिवीपालः शेतेऽयमतथोचितः ॥ ६५ ॥

मुझे धर्मका कोई ज्ञान नहीं है। मुझे धिक्कार है। मेरी बुद्धि और विद्याको भी धिक्कार है, जिसके कारण ये महाराज इस समय अपने लिये अयोग्य अवस्थामें पड़े हुए हैं ।। ६५ ।। अहमप्युपवत्स्यामि यथैवायं गुरुर्मम । यदि राजा न भुङ्क्तेऽयं गान्धारी च यशस्विनी ।। ६६ ।। यदि यशस्विनी गान्धारी देवी और राजा धृतराष्ट्र भोजन नहीं करते हैं तो अपने इन गुरुजनोंकी भाँति मैं भी उपवास करूँगा ।। ६६ ।।

वैशम्पायन उवाच

ततोऽस्य पाणिना राजन् जलशीतेन पाण्डवः । उरो मुखं च शनकैः पर्यमार्जत धर्मवित् ।। ६७ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! यह कहकर धर्मके ज्ञाता पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरने जलसे शीतल किये हुए हाथसे धृतराष्ट्रकी छाती और मुँहको धीरे-धीरे पोंछा ।। ६७ ।। तेन रत्नौषधिमता पुण्येन च सुगन्धिना । पाणिस्पर्शन राज्ञः स राजा संज्ञामवाप ह ।। ६८ ।। महाराज युधिष्ठिरके रत्नौषधिसम्पन्न उस पवित्र एवं सुगन्धित कर-स्पर्शसे राजा धृतराष्ट्रकी चेतना लौट आयी ।। ६८ ।।

धृतराष्ट्र उवाच

स्पृश मां पाणिना भूयः परिष्वज च पाण्डव । जीवामीवातिसंस्पर्शात् तव राजीवलोचन ।। ६९ ।। **धृतराष्ट्र बोले—**कमलनयन पाण्डुनन्दन! तुम फिरसे मेरे शरीरपर अपना हाथ फेरो और मुझे छातीसे लगा लो। तुम्हारे सुखदायक स्पर्शसे मानो मेरे शरीरमें प्राण आ जाते हैं ।। ६९ ।। मूर्धानं च तवाघ्रातुमिच्छामि मनुजाधिप । पाणिभ्यां हि परिस्प्रष्टुं प्रीणनं हि महन्मम ।। ७० ।। नरेश्वर! मैं तुम्हारा मस्तक सूँघना चाहता हूँ और अपने दोनों हाथोंसे तुम्हें स्पर्श करनेकी इच्छा रखता हूँ। इससे मुझे परम तृप्ति मिल रही है ।। ७० ।। अष्टमो ह्यद्य कालोऽयमाहारस्य कृतस्य मे । येनाहं कुरुशार्दूल शक्नोमि न विचेष्टितुम् ।। ७१ ।। पिछले दिनों जब मैंने भोजन किया था, तबसे आज यह आठवाँ समय—चौथा दिन पूरा हो गया है। कुरुश्रेष्ठ! इसीसे शिथिल होकर मैं कोई चेष्टा नहीं कर पाता ।। ७१ ।। व्यायामश्चायमत्यर्थं कृतस्त्वामभियाचता । ततो ग्लानमनास्तात नष्टसंज्ञ इवाभवम् ।। ७२ ।।

तात! तुमसे अनुरोध करनेके लिये बोलते समय मुझे बड़ा भारी परिश्रम करना पड़ा है। अतः क्षीणशक्ति होकर मैं अचेत-सा हो गया था ॥ ७२ ॥

तवामृतरसप्रख्यं हस्तस्पर्शमिमं प्रभो ।
लब्ध्वा संजीवितोऽस्मीति मन्ये कुरुकुलोद्वह ॥ ७३ ॥
प्रभो! तुम्हारे हाथोंका यह स्पर्श अमृत-रसके समान शीतल एवं सुखद है। कुरुकुलनाथ! इसे पाकर मुझमें नया जीवन आ गया है, मैं ऐसा मानता हूँ ॥ ७३ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु कौन्तेयः पित्रा ज्येष्ठेन भारत ।
पस्पर्श सर्वगात्रेषु सौहार्दात् तं शनैस्तदा ॥ ७४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—भारत! अपने ज्येष्ठ पितृव्य धृतराष्ट्रके ऐसा कहनेपर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने बड़े स्नेहके साथ उनके समस्त अंगोंपर धीरे-धीरे हाथ फेरा ॥ ७४ ॥

उपलभ्य ततः प्राणान् धृतराष्ट्रो महीपतिः ।
बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य मूर्ध्न्याजिघ्रत पाण्डवम् ॥ ७५ ॥
उनके स्पर्शसे राजा धृतराष्ट्रके शरीरमें मानो नूतन प्राण आ गये और उन्होंने अपनी दोनों भुजाओंसे युधिष्ठिरको छातीसे लगाकर उनका मस्तक सूँघा ॥ ७५ ॥

विदुरादयश्च ते सर्वे रुरुदुर्दुःखिता भृशम् ।
अतिदुःखात् तु राजानं नोचुः किंचन पाण्डवम् ॥ ७६ ॥
यह करुण दृश्य देखकर विदुर आदि सब लोग अत्यन्त दुःखी हो रोने लगे। अधिक दुःखके कारण वे लोग पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरसे कुछ न बोले ॥ ७६ ॥

गान्धारी त्वेव धर्मज्ञा मनसोद्वहती भृशम् ।
दुःखान्यधारयद् राजन् मैवमित्येव चाब्रवीत् ॥ ७७ ॥
धर्मको जाननेवाली गान्धारी अपने मनमें दुःखका बड़ा भारी बोझ ढो रही थी। उसने दुःखोंको मनमें ही दबा लिया और रोते हुए लोगोंसे कहा—'ऐसा न करो' ॥ ७७ ॥

इतरास्तु स्त्रियः सर्वाः कुन्त्या सह सुदुःखिताः ।
नेत्रैरागतविक्लेदैः परिवार्य स्थिताऽभवन् ॥ ७८ ॥
कुन्तीके साथ कुरुकुलकी अन्य स्त्रियाँ भी अत्यन्त दुःखी हो नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई उन्हें घेरकर खड़ी हो गयीं ॥ ७८ ॥

अथाब्रवीत् पुनर्वाक्यं धृतराष्ट्रो युधिष्ठिरम् ।
अनुजानीहि मां राजंस्तापस्ये भरतर्षभ ॥ ७९ ॥
तदनन्तर धृतराष्ट्रने पुनः युधिष्ठिरसे कहा—'राजन्! भरतश्रेष्ठ! मुझे तपस्याके लिये अनुमति दे दो ॥ ७९ ॥

ग्लायते मे मनस्तात भूयो भूयः प्रजल्पतः ।
न मामतः परं पुत्र परिक्लेष्टुमिहार्हसि ॥ ८० ॥
'तात! बार-बार बोलनेसे मेरा जी घबराता है, अतः बेटा! अब मुझे अधिक कष्टमें न डालो' ॥ ८० ॥

तस्मिंस्तु कौरवेन्द्रे तं तथा ब्रुवति पाण्डवम् ।
सर्वेषामेव योधानामार्त्तनादो महानभूत् ॥ ८१ ॥
कौरवराज धृतराष्ट्र जब पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरसे ऐसी बात कह रहे थे, उस समय वहाँ उपस्थित हुए समस्त योद्धा महान् आर्तनाद (हाहाकार) करने लगे ॥ ८१ ॥

दृष्ट्वा कृशं विवर्णं च राजानमथोचितम् ।
उपवासपरिश्रान्तं त्वगस्थिपरिवारणम् ॥ ८२ ॥
धर्मपुत्रः स्वपितरं परिष्वज्य महाप्रभुम् ।
शोकजं बाष्पमुत्सृज्य पुनर्वचनमब्रवीत् ॥ ८३ ॥
अपने ताऊ महाप्रभु राजा धृतराष्ट्रको इस प्रकार उपवास करनेके कारण थके हुए, दुर्बल, कान्तिहीन, अस्थिचर्मावशिष्ट और अयोग्य अवस्थामें स्थित देख धर्मपुत्र युधिष्ठिर क्षोभजनित आँसू बहाते हुए उनसे इस प्रकार बोले— ॥ ८२-८३ ॥

न कामये नरश्रेष्ठ जीवितं पृथिवीं तथा ।
यथा तव प्रियं राजंश्चिकीर्षामि परंतप ॥ ८४ ॥
'नरश्रेष्ठ! मैं न तो जीवन चाहता हूँ न पृथ्वीका राज्य। परंतप नरेश! जिस तरह भी आपका प्रिय हो, वही मैं करना चाहता हूँ ॥ ८४ ॥

यदि चाहमनुग्राह्यो भवतो दयितोऽपि वा ।
क्रियतां तावदाहारस्ततो वेत्स्याम्यहं परम् ॥ ८५ ॥
'यदि आप मुझे अपनी कृपाका पात्र समझते हों और यदि मैं आपका प्रिय होऊँ तो मेरी प्रार्थनासे इस समय भोजन कीजिये। इसके बाद मैं आगेकी बात सोचूँगा' ॥

ततोऽब्रवीन्महातेजा धृतराष्ट्रो युधिष्ठिरम् ।
अनुज्ञातस्त्वया पुत्र भुञ्जीयामिति कामये ॥ ८६ ॥
तब महातेजस्वी धृतराष्ट्रने युधिष्ठिरसे कहा—'बेटा! तुम मुझे वनमें जानेकी अनुमति दे दो तो मैं भोजन करूँ; यही मेरी इच्छा है' ॥ ८६ ॥

इति ब्रुवति राजेन्द्र धृतराष्ट्रे युधिष्ठिरम् ।
ऋषिः सत्यवतीपुत्रो व्यासोऽभ्येत्य वचोऽब्रवीत् ॥ ८७ ॥
महाराज धृतराष्ट्र युधिष्ठिरसे ये बातें कह ही रहे थे कि सत्यवतीनन्दन महर्षि व्यासजी वहाँ आ पहुँचे और इस प्रकार कहने लगे ॥ ८७ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि धृतराष्ट्रनिर्वेदे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष्ट्रका निर्वेदविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2267)

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चतुर्थोऽध्यायः

व्यासजीके समझानेसे युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रको वनमें जानेके लिये अनुमति देना

व्यास उवाच

युधिष्ठिर महाबाहो यथाह कुरुनन्दनः ।
धृतराष्ट्रो महातेजास्तत् कुरुष्वाविचारयन् ॥ १ ॥

**व्यासजी बोले—**महाबाहु युधिष्ठिर! कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले महातेजस्वी धृतराष्ट्र जो कुछ कह रहे हैं, उसे बिना विचारे पूरा करो ॥ १ ॥

अयं हि वृद्धो नृपतिर्हतपुत्रो विशेषतः ।
नेदं कृच्छ्रं चिरतरं सहेदिति मतिर्मम ॥ २ ॥

अब ये राजा बूढ़े हो गये हैं, विशेषतः इनके सभी पुत्र नष्ट हो चुके हैं। मेरा ऐसा विश्वास है कि अब ये इस कष्टको अधिक कालतक नहीं सह सकेंगे ॥ २ ॥

गान्धारी च महाभागा प्राज्ञा करुणवेदिनी ।
पुत्रशोकं महाराज धैर्येणोद्वहते भृशम् ॥ ३ ॥

महाराज! महाभागा गान्धारी परम विदुषी और करुणाका अनुभव करनेवाली हैं; इसलिये ये महान् पुत्रशोकको धैर्यपूर्वक सहती चली आ रही हैं ॥ ३ ॥

अहमप्येतदेव त्वां ब्रवीमि कुरु मे वचः ।
अनुज्ञां लभतां राजा मा वृथेह मरिष्यति ॥ ४ ॥
मैं भी तुमसे यही कहता हूँ, तुम मेरी बात मानो। राजा धृतराष्ट्रको तुम्हारी ओरसे वनमें जानेकी अनुमति मिलनी ही चाहिये, नहीं तो यहाँ रहनेसे इनकी व्यर्थ मृत्यु होगी ॥ ४ ॥

राजर्षीणां पुराणानामनुयातु गतिं नृपः ।
राजर्षीणां हि सर्वेषामन्ते वनमुपाश्रयः ॥ ५ ॥
तुम उन्हें अवसर दो, जिससे ये नरेश प्राचीन राजर्षियोंके पथका अनुसरण कर सकें। समस्त राजर्षियोंने जीवनके अन्तिम भागमें वनका ही आश्रय लिया है ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्तः स तदा राजा व्यासेनाद्भुतकर्मणा ।
प्रत्युवाच महातेजा धर्मराजो महामुनिम् ॥ ६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! अद्भुतकर्मा व्यासजीके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी धर्मराज युधिष्ठिरने उन महामुनिको इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ ६ ॥

भगवानेव नो मान्यो भगवानेव नो गुरुः ।
भगवानस्य राज्यस्य कुलस्य च परायणम् ॥ ७ ॥

'भगवन्! आप ही हमलोगोंके माननीय और आप ही हमारे गुरु हैं। इस राज्य और पुरके परम आधार भी आप ही हैं ।। ७ ।। अहं तु पुत्रो भगवन् पिता राजा गुरुश्च मे । निदेशवर्ती च पितुः पुत्रो भवति धर्मतः ॥ ८ ॥ 'भगवन्! राजा धृतराष्ट्र हमारे पिता और गुरु हैं। धर्मतः पुत्र ही पिताकी आज्ञाके अधीन होता है। (वह पिताको आज्ञा कैसे दे सकता है)' ।। ८ ।।

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्तः स तु तं प्राह व्यासो वेदविदां वरः । युधिष्ठिरं महातेजाः पुनरेव महाकविः ॥ ९ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, महातेजस्वी, महाज्ञानी व्यासजीने युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर उन्हें समझाते हुए पुनः इस प्रकार कहा— ।। ९ ।। एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि भारत । राजायं वृद्धतां प्राप्तः प्रमाणे परमे स्थितः ॥ १० ॥ 'महाबाहु भरतनन्दन! तुम जैसा कहते हो, वैसा ही ठीक है, तथापि राजा धृतराष्ट्र बूढ़े हो गये हैं और अन्तिम अवस्थामें स्थित हैं ।। १० ।। सोऽयं मयाभ्यनुज्ञातस्त्वया च पृथिवीपतिः । करोतु स्वमभिप्रायं मास्य विघ्नकरो भव ॥ ११ ॥ 'अतः अब ये भूपाल मेरी और तुम्हारी अनुमति लेकर तपस्याके द्वारा अपना मनोरथ सिद्ध करें। इनके शुभ कार्यमें विघ्न न डालो ।। ११ ।। एष एव परो धर्मो राजर्षीणां युधिष्ठिर । समरे वा भवेन्मृत्युर्वने वा विधिपूर्वकम् ॥ १२ ॥ 'युधिष्ठिर! राजर्षियोंका यही परम धर्म है कि युद्धमें अथवा वनमें उनकी शास्त्रोक्त विधिपूर्वक मृत्यु हो ।। पित्रा तु तव राजेन्द्र पाण्डुना पृथिवीक्षिता । शिष्यवृत्तेन राजायं गुरुवत् पर्युपासितः ॥ १३ ॥ 'राजेन्द्र! तुम्हारे पिता राजा पाण्डुने भी धृतराष्ट्रको गुरुके समान मानकर शिष्यभावसे इनकी सेवा की थी ।। क्रतुभिर्दक्षिणावद्भी रत्नपर्वतशोभितैः । महद्भिरिष्टं गौर्भुक्ता प्रजाश्च परिपालिताः ॥ १४ ॥ 'इन्होंने रत्नमय पर्वतोंसे सुशोभित और प्रचुर दक्षिणासे सम्पन्न अनेक बड़े-बड़े यज्ञ किये हैं, पृथ्वीका राज्य भोगा है और प्रजाका भलीभाँति पालन किया है ।। पुत्रसंस्थं च विपुलं राज्यं विप्रोषिते त्वयि ।

त्रयोदशसमा भुक्तं दत्तं च विविधं वसु ॥ १५ ॥ ‘जब तुम वनमें चले गये थे, उन दिनों तेरह वर्षोंतक अपने पुत्रके अधीन रहनेवाले विशाल राज्यका इन्होंने उपभोग किया और नाना प्रकारके धन दिये हैं ॥ त्वया चायं नरव्याघ्र गुरुशुश्रूषयानघ । आराधितः सभृत्येन गान्धारी च यशस्विनी ॥ १६ ॥ ‘निष्पाप नरव्याघ्र! सेवकोंसहित तुमने भी गुरुसेवाके भावसे इनकी तथा यशस्विनी गान्धारी देवीकी आराधना की है ॥ १६ ॥ अनुजानीहि पितरं समयोऽस्य तपोविधौ । न मन्युर्विद्यते चास्य सुसूक्ष्मोऽपि युधिष्ठिर ॥ १७ ॥ ‘अतः तुम अपने पिताको वनमें जानेकी अनुमति दे दो; क्योंकि अब इनके तप करनेका समय आया है। युधिष्ठिर! इनके मनमें तुम्हारे ऊपर अणुमात्र भी रोष नही है’ ॥ १७ ॥

वैशम्पायन उवाच

एतावदुक्त्वा वचनमनुमान्य च पार्थिवम् । तथास्त्विति च तेनोक्तः कौन्तेयेन ययौ वनम् ॥ १८ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! यों कहकर महर्षि व्यासने राजा युधिष्ठिरको राजी कर लिया और ‘बहुत अच्छा’ कहकर जब युधिष्ठिरने उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली, तब वे वनमें अपने आश्रमपर चले गये ॥ १८ ॥ गते भगवति व्यासे राजा पाण्डुसुतस्तदा । प्रोवाच पितरं वृद्धं मन्दं मन्दमिवानतः ॥ १९ ॥ भगवान् व्यासके चले जानेपर राजा युधिष्ठिरने अपने बूढ़े ताऊ धृतराष्ट्रसे नम्रतापूर्वक धीरे-धीरे कहा— ॥ यदाह भगवान् व्यासो यच्चापि भवतो मतम् । यथाऽऽह च महेष्वासः कृपो विदुर एव च ॥ २० ॥ युयुत्सुः संजयश्चैव तत्कर्तास्म्यहमञ्जसा । सर्व एव हि मान्या मे कुलस्य हि हितैषिणः ॥ २१ ॥ ‘पिताजी! भगवान् व्यासने जो आज्ञा दी है और आपने जो कुछ करनेका निश्चय किया है तथा महान् धनुर्धर कृपाचार्य, विदुर, युयुत्सु और संजय जैसा कहेंगे, निस्संदेह मैं वैसा ही करूँगा; क्योंकि ये सब लोग इस कुलके हितैषी होनेके कारण मेरे लिये माननीय हैं ॥ २०-२१ ॥ इदं तु याचे नृपते त्वामहं शिरसा नतः । क्रियतां तावदाहारस्ततो गच्छाश्रमं प्रति ॥ २२ ॥

‘किंतु नरेश्वर! इस समय आपके चरणोंमें मस्तक झुकाकर मैं यह प्रार्थना करता हूँ कि पहले भोजन कर लीजिये, फिर आश्रमको जाइयेगा’ ।। २२ ।।

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि व्यासानुज्ञायां चतुर्थोऽध्यायः ।। ४ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें व्यासकी आज्ञाविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ।। ४ ।।

अध्याय (पृष्ठ 2272)

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पञ्चमोऽध्यायः

धृतराष्ट्रके द्वारा युधिष्ठिरको राजनीतिका उपदेश

वैशम्पायन उवाच

ततो राज्ञाभ्यनुज्ञातो धृतराष्ट्रः प्रतापवान् ।
ययौ स्वभवनं राजा गान्धार्यानुगतस्तदा ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**तदनन्तर जनमेजय! राजा युधिष्ठिरकी अनुमति पाकर प्रतापी राजा धृतराष्ट्र गान्धारीके साथ अपने भवनमें गये ॥ १ ॥

मन्दप्राणगतिर्धीमान् कृच्छ्रादिव समुद्वहन् ।
पदातिः स महीपालो जीर्णो गजपतिर्यथा ॥ २ ॥
उस समय उनकी चलने-फिरनेकी शक्ति बहुत कम हो गयी थी। वे बुद्धिमान् भूपाल बूढ़े हाथीकी भाँति पैदल चलते समय बड़ी कठिनाईसे पैर उठाते थे ॥ २ ॥

तमन्वगच्छद् विदुरो विद्वान् सूतश्च संजयः ।
स चापि परमेष्वासः कृपः शारद्वतस्तथा ॥ ३ ॥
उस समय उनके पीछे-पीछे ज्ञानी विदुर, सारथि संजय तथा शरद्वान्‌के पुत्र महाधनुर्धर कृपाचार्य भी गये ॥

स प्रविश्य गृहं राजन् कृतपूर्वाह्निकक्रियः ।
तर्पयित्वा द्विजश्रेष्ठानाहारमकरोत् तदा ॥ ४ ॥
राजन्! घरमें प्रवेश करके उन्होंने पूर्वाह्नकालकी धार्मिक क्रिया पूरी की; फिर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको अन्न-पान आदिसे तृप्त करके स्वयं भी भोजन किया ॥ ४ ॥

गान्धारी चैव धर्मज्ञा कुन्त्या सह मनस्विनी ।
वधूभिरुपचारेण पूजिताभुङ्क्त भारत ॥ ५ ॥
भरतनन्दन! इसी प्रकार धर्मको जाननेवाली मनस्विनी गान्धारी देवीने भी कुन्तीसहित पुत्रवधुओं‌द्वारा विविध उपचारोंसे पूजित होकर आहार ग्रहण किया ॥ ५ ॥

कृताहारं कृताहाराः सर्वे ते विदुरादयः ।
पाण्डवाश्च कुरुश्रेष्ठमुपातिष्ठन्त तं नृपम् ॥ ६ ॥
कुरुश्रेष्ठ राजा धृतराष्ट्रके भोजन कर लेनेपर पाण्डव तथा विदुर आदि सब लोगोंने भी भोजन किया, फिर सब-के-सब धृतराष्ट्रकी सेवामें उपस्थित हुए ॥

ततोऽब्रवीन्महाराज कुन्तीपुत्रमुपह्वरे ।
निषण्णं पाणिना पृष्ठे संस्पृशन्नम्बिकासुतः ॥ ७ ॥
महाराज! उस समय कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको एकान्तमें अपने निकट बैठा जान धृतराष्ट्रने उनकी पीठपर हाथ फेरते हुए कहा— ॥ ७ ॥

अप्रमादस्त्वया कार्यः सर्वथा कुरुनन्दन ।
अष्टाङ्गे राजशार्दूल राज्ये धर्मपुरस्कृते ॥ ८ ॥
‘कुरुनन्दन! राजसिंह! इस आठ अंगोंवाले राज्यमें तुम सदा धर्मको ही आगे रखना और इसके संरक्षण और संचालनमें कभी किसी तरह भी प्रमाद न करना ॥ ८ ॥

तत्तु शक्यं महाराज रक्षितुं पाण्डुनन्दन ।
राज्यं धर्मेण कौन्तेय विद्वानसि निबोध तत् ॥ ९ ॥
‘महाराज पाण्डुनन्दन! कुन्तीकुमार! राज्यकी रक्षा धर्मसे ही हो सकती है। इस बातको तुम स्वयं भी जानते हो तथापि मुझसे भी सुनो ॥ ९ ॥

विद्यावृद्धान् सदैव त्वमुपासीथा युधिष्ठिर ।
शृणुयास्ते च यद् ब्रूयुः कुर्याश्चैवाविचारयन् ॥ १० ॥
‘युधिष्ठिर! विद्यामें बढ़े-चढ़े विद्वान् पुरुषोंका सदा ही संग किया करो। वे जो कुछ कहें, उसे ध्यानपूर्वक सुनो और उसका बिना विचारे पालन करो’ ॥

प्रातरुत्थाय तान् राजन् पूजयित्वा यथाविधि ।
कृत्यकाले समुत्पन्ने पृच्छेथाः कार्यमात्मनः ॥ ११ ॥
‘राजन्! प्रातःकाल उठकर उन विद्वानोंका यथायोग्य सत्कार करके कोई कार्य उपस्थित होनेपर उनसे अपना कर्तव्य पूछो ॥ ११ ॥

ते तु सम्मानिता राजंस्त्वया कार्यहितार्थिना ।
प्रवक्ष्यन्ति हितं तात सर्वथा तव भारत ॥ १२ ॥
'राजन्! तात! भरतनन्दन! अपना हित करनेकी इच्छासे तुम्हारे द्वारा सम्मानित होनेपर वे सर्वथा तुम्हारे हितकी ही बात बतायेंगे ॥ १२ ॥

इन्द्रियाणि च सर्वाणि वाजिवत् परिपालय ।
हितायैव भविष्यन्ति रक्षितं द्रविणं यथा ॥ १३ ॥
'जैसे सारथि घोड़ोंको काबूमें रखता है, उसी प्रकार तुम सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने अधीन रखकर उनकी रक्षा करो। ऐसा करनेसे वे इन्द्रियाँ सुरक्षित धनकी भाँति भविष्यमें तुम्हारे लिये निश्चय ही हितकर होंगी ॥ १३ ॥

अमात्यानुपधातीतान् पितृपैतामहान् शुचीन् ।
दान्तान् कर्मसु पुण्यांश्च पुण्यान् सर्वेषु योजयेः ॥ १४ ॥
'जो जाँचे-बूझे हुए तथा निष्कपटभावसे काम करनेवाले हों, जो पिता-पितामहोंके समयसे काम देखते आ रहे हों तथा जो बाहर-भीतरसे शुद्ध, संयमी और जन्म एवं कर्मसे भी पवित्र हों, ऐसे मन्त्रियोंको ही सब तरहके उत्तरदायित्वपूर्ण कार्योंमें नियुक्त करना ॥ १४ ॥

चारयेथाश्च सततं चारैरविदितः परैः ।
परीक्षितैर्बहुविधैः स्वराष्ट्रप्रतिवासिभिः ॥ १५ ॥
'जिनकी किसी अवसरपर परीक्षा कर ली गयी हो और जो अपने ही राज्यके भीतर निवास करनेवाले हों, ऐसे अनेक जासूसोंको भेजकर उनके द्वारा शत्रुओंका गुप्त भेद लेते रहना और प्रयत्नपूर्वक ऐसी चेष्टा करना, जिससे शत्रु तुम्हारा भेद न जान सकें' ॥ १५ ॥

पुरं च ते सुगुप्तं स्याद् दृढप्राकारतोरणम् ।
अट्टाट्टालकसम्बाधं षट्पदं सर्वतोदिशम् ॥ १६ ॥
'तुम्हारे नगरकी रक्षाका पूर्ण प्रबन्ध रहना चाहिये। उसके चारों ओरकी दीवारें तथा मुख्य द्वार अत्यन्त सुदृढ़ होने चाहिये। बीचका सारा नगर ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओंसे भरा होना चाहिये। सब दिशाओंमें छः चहारदीवारियाँ बननी चाहिये ॥ १६ ॥

तस्य द्वाराणि सर्वाणि पर्याप्तानि बृहन्ति च ।
सर्वतः सुविभक्तानि यन्त्रैरारक्षितानि च ॥ १७ ॥
'नगरके सभी दरवाजे विस्तृत एवं विशाल हों। सब ओर उनकी रक्षाके लिये यन्त्र लगे हों तथा उन द्वारोंका विभाग सुन्दर ढंगसे सम्पन्न हो ॥ १७ ॥

पुरुषैरलमर्थस्ते विदितैः कुलशीलतः ।
आत्मा च रक्ष्यः सततं भोजनादिषु भारत ॥ १८ ॥
'भारत! जिन मनुष्योंके कुल और शील अच्छी तरह ज्ञात हों, उन्हींसे तुम्हें काम लेना चाहिये। भोजन आदिके अवसरोंपर सदा तुम्हें आत्मरक्षापर ध्यान देना चाहिये ॥ १८ ॥