महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्वं तु शस्त्रभृतां श्रेष्ठः सततं धर्मवत्सलः ।। ३५ ।। राजा गुरुः प्राणभृतां तस्मादेतद् ब्रवीम्यहम् । अनुज्ञातस्त्वया वीर संश्रयेयं वनान्यहम् ।। ३६ ।। ‘तुम शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ और सदा धर्मपर अनुराग रखनेवाले हो। राजा समस्त प्राणियोंके लिये गुरुजनकी भाँति आदरणीय होता है। इसलिये तुमसे ऐसा अनुरोध करता हूँ। वीर! तुम्हारी अनुमति मिल जानेपर मैं वनको चला जाऊँगा ।। ३५-३६ ।। चीरवल्कलभृद् राजन् गान्धार्या सहितोऽनया । तवाशिषः प्रयुञ्जानो भविष्यामि वनेचरः ।। ३७ ।। ‘राजन्! वहाँ मैं चीर और वल्कल धारण करके इस गान्धारीके साथ वनमें विचरूँगा और तुम्हें आशीर्वाद देता रहूँगा ।। ३७ ।। उचितं नः कुले तात सर्वेषां भरतर्षभ । पुत्रेष्वैश्वर्यमाधाय वयसोऽन्ते वनं नृप ।। ३८ ।। ‘तात! भरतश्रेष्ठ नरेश्वर! हमारे कुलके सभी राजाओंके लिये यही उचित है कि वे अन्तिम अवस्थामें पुत्रोंको राज्य देकर स्वयं वनमें पधारें ।। ३८ ।। तत्राहं वायुभक्षो वा निराहारोऽपि वा वसन् । पत्न्या सहानया वीर चरिष्यामि तपः परम् ।। ३९ ।। ‘वीर! वहाँ मैं वायु पीकर अथवा उपवास करके रहूँगा तथा अपनी इस धर्मपत्नीके साथ उत्तम तपस्या करूँगा ।। ३९ ।। त्वं चापि फलभाक् तात तपसः पार्थिवो ह्यसि । फलभाजो हि राजानः कल्याणस्येतरस्य वा ।। ४० ।। ‘बेटा! तुम भी उस तपस्याके उत्तम फलके भागी बनोगे; क्योंकि तुम राजा हो और राजा अपने राज्यके भीतर होनेवाले भले-बुरे सभी कर्मोंके फलभागी होते हैं’ ।। ४० ।। युधिष्ठिर उवाच न मां प्रीणयते राज्यं त्वय्येवं दुःखिते नृप । धिङ्मामस्तु सुदुर्बुद्धिं राज्यसक्तं प्रमादिनम् ।। ४१ ।। युधिष्ठिरने कहा—महाराज! आप यहाँ रहकर इस प्रकार दुःख उठा रहे थे और मुझे इसकी जानकारी न हो सकी, इसलिये अब यह राज्य मुझे प्रसन्न नहीं रख सकता। हाय! मेरी बुद्धि कितनी खराब है? मुझ-जैसे प्रमादी और राज्यासक्त पुरुषको धिक्कार है ।। ४१ ।। योऽहं भवन्तं दुःखार्तमुपवासकृशं भृशम् । जिताहारं क्षितिशयं न विन्दे भ्रातृभिः सह ।। ४२ ।।