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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2259, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2259

आप दुःखसे आतुर और उपवास करनेके कारण अत्यन्त दुर्बल होकर पृथ्वीपर शयन

कर रहे हैं तथा भोजनपर भी संयम कर लिया है और मैं भाइयोंसहित आपकी इस

अवस्थाका पता ही न पा सका ।। ४२ ।।

अहोऽस्मि वञ्चितो मूढो भवता गूढबुद्धिना ।

विश्वासयित्वा पूर्वं मां यदिदं दुःखमश्रुथाः ।। ४३ ।।

अहो! आपने अपने विचारोंको छिपाकर मुझ मूर्खको अबतक धोखेमें ही डाल रखा

था; क्योंकि पहले मुझे यह विश्वास दिलाकर कि मैं सुखी हूँ, आप आजतक यह दुःख

भोगते रहे ।। ४३ ।।

किं मे राज्येन भोगैर्वा किं यज्ञैः किं सुखेन वा ।

यस्य मे त्वं महीपाल दुःखान्येतान्यवाप्तवान् ।। ४४ ।।

महाराज! इस राज्यसे, इन भोगोंसे, इन यज्ञोंसे अथवा इस सुख-सामग्रीसे मुझे क्या

लाभ हुआ? जब कि मेरे ही पास रहकर आपको इतने दुःख उठाने पड़े ।।

पीडितं चापि जानामि राज्यमात्मानमेव च ।

अनेन वचसा तुभ्यं दुःखितस्य जनेश्वर ।। ४५ ।।

जनेश्वर! आप दुःखी होकर जो ऐसी बात कह रहे हैं, इससे मैं उस समस्त राज्यको

और अपनेको भी दुःखित समझता हूँ ।। ४५ ।।

भवान् पिता भवान् माता भवान् नः परमो गुरुः ।

भवता विप्रहीणा वै क्व नु तिष्ठामहे वयम् ।। ४६ ।।

आप ही हमारे पिता, आप ही माता और आप ही हमारे परम गुरु हैं। आपसे विलग

होकर हम कहाँ रहेंगे ।। ४६ ।।

औरसो भवतः पुत्रो युयुत्सुर्नृपसत्तम ।

अस्तु राजा महाराज यमन्यं मन्यते भवान् ।। ४७ ।।

अहं वनं गमिष्यामि भवान् राज्यं प्रशासतु ।

न मामयशसा दग्धं भूयस्त्वं दग्धुमर्हसि ।। ४८ ।।

नृपश्रेष्ठ! महाराज! युयुत्सु आपके औरस पुत्र हैं; ये ही राजा हों अथवा और किसीको

जिसे आप उचित समझते हों, राजा बना दें या स्वयं ही इस राज्यका शासन करें। मैं ही

वनको चला जाऊँगा। पिताजी! मैं पहलेसे ही अपयशकी आगमें जल चुका हूँ, अब पुनः

आप भी मुझे न जलाइये ।। ४७-४८ ।।

नाहं राजा भवान् राजा भवतः परवानहम् ।

कथं गुरुं त्वां धर्मज्ञमनुज्ञातुमिहोत्सहे ।। ४९ ।।

मैं राजा नहीं, आप ही राजा हैं। मैं तो आपकी आज्ञाके अधीन रहनेवाला सेवक हूँ।

आप धर्मके ज्ञाता गुरु हैं। मैं आपको कैसे आज्ञा दे सकता हूँ ।। ४९ ।।

न मन्युर्हृदि नः कश्चित् सुयोधनकृतेऽनघ ।