महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2262, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतं तु दृष्ट्वा समासीनं विसंज्ञमिव कौरवम् । आर्तिं राजागमत् तीव्रां कौन्तेयः परवीरहा ॥ ६२ ॥ कुरुराज धृतराष्ट्रको संज्ञाहीन-सा बैठा देख शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले कुन्तीकुमार राजा युधिष्ठिरको बड़ा दुःख हुआ ॥ ६२ ॥
युधिष्ठिर उवाच यस्य नागसहस्रेण शतसंख्येन वै बलम् । सोऽयं नारीं व्यपाश्रित्य शेते राजा गतासुवत् ॥ ६३ ॥ **युधिष्ठिरने कहा—**ओह! जिसमें एक लाख हाथियोंके समान बल था, वे ही ये राजा धृतराष्ट्र आज प्राणहीन-से होकर स्त्रीका सहारा लिये सो रहे हैं ॥ ६३ ॥ आयसी प्रतिमा येन भीमसेनस्य सा पुरा । चूर्णीकृता बलवता सोऽबलामाश्रितः स्त्रियम् ॥ ६४ ॥ जिन बलवान् नरेशने पहले भीमसेनकी लोहमयी प्रतिमाको चूर्ण कर डाला था, वे आज अबला नारीके सहारे पड़े हैं ॥ ६४ ॥ धिगस्तु मामधर्मज्ञं धिग् बुद्धिं धिक् च मे श्रुतम् । यत्कृते पृथिवीपालः शेतेऽयमतथोचितः ॥ ६५ ॥