महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2263, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुझे धर्मका कोई ज्ञान नहीं है। मुझे धिक्कार है। मेरी बुद्धि और विद्याको भी धिक्कार है, जिसके कारण ये महाराज इस समय अपने लिये अयोग्य अवस्थामें पड़े हुए हैं ।। ६५ ।। अहमप्युपवत्स्यामि यथैवायं गुरुर्मम । यदि राजा न भुङ्क्तेऽयं गान्धारी च यशस्विनी ।। ६६ ।। यदि यशस्विनी गान्धारी देवी और राजा धृतराष्ट्र भोजन नहीं करते हैं तो अपने इन गुरुजनोंकी भाँति मैं भी उपवास करूँगा ।। ६६ ।।
वैशम्पायन उवाच
ततोऽस्य पाणिना राजन् जलशीतेन पाण्डवः । उरो मुखं च शनकैः पर्यमार्जत धर्मवित् ।। ६७ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! यह कहकर धर्मके ज्ञाता पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरने जलसे शीतल किये हुए हाथसे धृतराष्ट्रकी छाती और मुँहको धीरे-धीरे पोंछा ।। ६७ ।। तेन रत्नौषधिमता पुण्येन च सुगन्धिना । पाणिस्पर्शन राज्ञः स राजा संज्ञामवाप ह ।। ६८ ।। महाराज युधिष्ठिरके रत्नौषधिसम्पन्न उस पवित्र एवं सुगन्धित कर-स्पर्शसे राजा धृतराष्ट्रकी चेतना लौट आयी ।। ६८ ।।
धृतराष्ट्र उवाच
स्पृश मां पाणिना भूयः परिष्वज च पाण्डव । जीवामीवातिसंस्पर्शात् तव राजीवलोचन ।। ६९ ।। **धृतराष्ट्र बोले—**कमलनयन पाण्डुनन्दन! तुम फिरसे मेरे शरीरपर अपना हाथ फेरो और मुझे छातीसे लगा लो। तुम्हारे सुखदायक स्पर्शसे मानो मेरे शरीरमें प्राण आ जाते हैं ।। ६९ ।। मूर्धानं च तवाघ्रातुमिच्छामि मनुजाधिप । पाणिभ्यां हि परिस्प्रष्टुं प्रीणनं हि महन्मम ।। ७० ।। नरेश्वर! मैं तुम्हारा मस्तक सूँघना चाहता हूँ और अपने दोनों हाथोंसे तुम्हें स्पर्श करनेकी इच्छा रखता हूँ। इससे मुझे परम तृप्ति मिल रही है ।। ७० ।। अष्टमो ह्यद्य कालोऽयमाहारस्य कृतस्य मे । येनाहं कुरुशार्दूल शक्नोमि न विचेष्टितुम् ।। ७१ ।। पिछले दिनों जब मैंने भोजन किया था, तबसे आज यह आठवाँ समय—चौथा दिन पूरा हो गया है। कुरुश्रेष्ठ! इसीसे शिथिल होकर मैं कोई चेष्टा नहीं कर पाता ।। ७१ ।। व्यायामश्चायमत्यर्थं कृतस्त्वामभियाचता । ततो ग्लानमनास्तात नष्टसंज्ञ इवाभवम् ।। ७२ ।।