भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2276, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2276

पौरजानपदानां च शौचाशौचे युधिष्ठिर ॥ २६ ॥

यथा स्याद् विदितं राजंस्तथा कार्यं कुरुद्वह ।

‘राजन्! कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर! नगर और जनपदके लोगोंका हृदय तुम्हारे प्रति शुद्ध है या

अशुद्ध, इस बातका तुम्हें जैसे भी ज्ञान प्राप्त हो सके, वैसा उपाय करना ॥ २६ १/२ ॥

व्यवहारश्च ते राजन् नित्यमाप्तैरधिष्ठितः ॥ २७ ॥

योज्यस्तुस्तैर्हितै राजन् नित्यं चारैरनुष्ठितः ।

‘नरेश्वर! न्याय करनेके कामपर तुम सदा ऐसे ही पुरुषोंको नियुक्त करना, जो

विश्वासपात्र, संतोषी और हितैषी हों तथा गुप्तचरोंके द्वारा सदा उनके कार्योंपर दृष्टि

रखना ॥ २७ १/२ ॥

परिमाणं विदित्वा च दण्डं दण्ड्येषु भारत ॥ २८ ॥

प्रणयेयुर्यथान्यायं पुरुषास्ते युधिष्ठिर ।

‘भरतनन्दन युधिष्ठिर! तुम्हें ऐसा विधान बनाना चाहिये, जिससे तुम्हारे नियुक्त किये

हुए न्यायाधिकारी पुरुष अपराधियोंके अपराधकी मात्राको भलीभाँति जानकर जो

दण्डनीय हों, उन्हें ही उचित दण्ड दें ॥

आदानरुचयश्चैव परदाराभिमर्शिनः ॥ २९ ॥

उग्रदण्डप्रधानाश्च मिथ्या व्याहारिणस्तथा ।

आक्रोष्टारश्च लुब्धाश्च हर्तारः साहसप्रियाः ॥ ३० ॥

सभाविहारभेत्तारो वर्णानां च प्रदूषकाः ।

हिरण्यदण्ड्या वध्याश्च कर्तव्या देशकालतः ॥ ३१ ॥

‘जो दूसरोंसे घूस लेनेकी रुचि रखते हों, परायी स्त्रियोंसे जिनका सम्पर्क हो, जो

विशेषतः कठोर दण्ड देनेके पक्षपाती हों, झूठा फैसला देते हों, जो कटुवादी, लोभी,

दूसरोंका धन हड़पनेवाले, दुस्साहसी, सभाभवन और उद्यान आदिको नष्ट करनेवाले तथा

सभी वर्णके लोगोंको कलंकित करनेवाले हों, उन न्यायाधिकारियोंको देश-कालका ध्यान

रखते हुए सुवर्णदण्ड अथवा प्राणदण्डके द्वारा दण्डित करना चाहिये ॥ २९—३१ ॥

प्रातरेव हि पश्येथा ये कुर्युर्व्ययकर्म ते ।

अलंकारमथो भोज्यमत ऊर्ध्वं समाचरेः ॥ ३२ ॥

‘प्रातःकाल उठकर (नित्य नियमसे निवृत्त होनेके बाद) पहले तुम्हें उन लोगोंसे मिलना

चाहिये, जो तुम्हारे खर्च-बर्चेके कामपर नियुक्त हों। उसके बाद आभूषण पहनने या भोजन

करनेके कामपर ध्यान देना चाहिये ॥

पश्येथाश्च ततो योधान् सदा त्वं प्रतिहर्षयन् ।

दूतानां च चराणां च प्रदोषस्ते सदा भवेत् ॥ ३३ ॥

‘तत्पश्चात् सैनिकोंका हर्ष और उत्साह बढ़ाते हुए उनसे मिलना चाहिये। दूतों और

जासूसोंसे मिलनेके लिये तुम्हारे लिये सर्वोत्तम समय संध्याकाल है ॥ ३३ ॥