महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2277, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसदा चापररात्रान्ते भवेत् कार्यार्थनिर्णयः । मध्यरात्रे विहारस्ते मध्याह्ने च सदा भवेत् ॥ ३४ ॥ ‘पहरभर रात बाकी रहते ही उठकर अगले दिनके कार्य-क्रमका निश्चय कर लेना चाहिये। आधी रात और दोपहरके समय तुम्हें स्वयं घूम-फिरकर प्रजाकी अवस्थाका निरीक्षण करना उचित है ॥ ३४ ॥ सर्वे त्वौपयिकाः कालाः कार्याणां भरतर्षभ । तथैवालंकृतः काले तिष्ठेथा भूरिदक्षिण ॥ ३५ ॥ ‘प्रचुर दक्षिणा देनेवाले भरतश्रेष्ठ! काम करनेके लिये सभी समय उपयोगी हैं तथा तुम्हें समय-समयपर सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत रहना चाहिये ॥ ३५ ॥ चक्रवत् तात कार्याणां पर्यायो दृश्यते सदा । कोशस्य निचये यत्नं कुर्वीथा न्यायतः सदा ॥ ३६ ॥ विविधस्य महाराज विपरीतं विवर्जयेः । ‘तात! चक्रकी भाँति सदा कार्योंका क्रम चलता रहता है, यह देखनेमें आता है। महाराज! नाना प्रकारके कोषका संग्रह करनेके लिये तुम्हें सदा न्यायाानुकूल प्रयत्न करना चाहिये। इसके विपरीत अन्यायपूर्ण प्रयत्नको त्याग देना चाहिये ॥ ३६ १/२ ॥ चारैर्विदित्वा शत्रूंश्च ये राज्ञामन्तरैषिणः ॥ ३७ ॥ तानाप्तैः पुरुषैर्दूरद् घातयेथा नराधिप । ‘नरेश्वर! जो राजाओंके छिद्र देखा करते हैं, ऐसे राजविद्रोही शत्रुओंका गुप्तचरोंद्वारा पता लगाकर विश्वसनीय पुरुषोंद्वारा उन्हें दूरसे ही मरवा डालना चाहिये ॥ ३७ १/२ ॥ कर्म दृष्ट्वाथ भृत्यांस्त्वं वरयेथाः कुरूद्वह ॥ ३८ ॥ कारयेथाश्च कर्माणि युक्तायुक्तैरधिष्ठितैः । ‘कुरुश्रेष्ठ! पहले काम देखकर सेवकोंको नियुक्त करना चाहिये और अपने आश्रित मनुष्य योग्य हों या अयोग्य, उनसे काम अवश्य लेना चाहिये ॥ ३८ १/२ ॥ सेनाप्रणेता च भवेत् तव तात दृढव्रतः ॥ ३९ ॥ शूरः क्लेशसहश्चैव हितो भक्तश्च पूरुषः । ‘तात! तुम्हारे सेनापतिको दृढप्रतिज्ञ, शूरवीर, क्लेश सह सकनेवाला, हितैषी, पुरुषार्थी और स्वामिभक्त होना चाहिये ॥ ३९ १/२ ॥ सर्वे जनपदाश्चैव तव कर्माणि पाण्डव ॥ ४० ॥ गोवद्रासभवच्चैव कुर्युर्ये व्यवहारिणः । ‘पाण्डुनन्दन! तुम्हारे राज्यके अंदर रहनेवाले जो कारीगर और शिल्पी तुम्हारा काम करें, तुम्हें उनके भरण-पोषणका प्रबन्ध अवश्य करना चाहिये; जैसे गधों और बैलोंसे काम लेनेवाले लोग उन्हें खानेको देते हैं ॥ ४० १/२ ॥