भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2284, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2284

त्याग देना चाहिये ॥ ६ ॥ आददीत बलं राजा मौलं मित्रबलं तथा । अटवीबलं भृतं चैव तथा श्रेणीबलं प्रभो ॥ ७ ॥ प्रभो! राजाको अपने पास सैनिकबल, धनबल, मित्रबल, अरण्यबल, भृत्यबल और श्रेणीबलका संग्रह करना चाहिये ॥ ७ ॥ तत्र मित्रबलं राजन् मौलं चैव विशिष्यते । श्रेणीबलं भृतं चैव तुल्ये एवेति मे मतिः ॥ ८ ॥ राजन्! इनमें मित्रबल और धनबल सबसे बढ़कर है। श्रेणीबल और भृत्यबल—ये दोनों समान ही हैं, ऐसा मेरा विश्वास है ॥ ८ ॥ तथा चारबलं चैव परस्परसमं नृप । विज्ञेयं बहुकालेषु राज्ञा काल उपस्थिते ॥ ९ ॥ नरेश्वर! चारबल (दूतोंका बल) भी परस्पर समान ही है। राजाको समय आनेपर अधिक अवसरोंपर इस तत्त्वको समझे रहना चाहिये ॥ ९ ॥ आपदश्चापि बोद्धव्या बहुरूपा नराधिप । भवन्ति राज्ञा कौरव्य यास्ताः पृथगतः शृणु ॥ १० ॥ महाराज! कुरुनन्दन! राजापर आनेवाली अनेक प्रकारकी आपत्तियाँ भी होती हैं, जिन्हें जानना चाहिये। अतः उनका पृथक्-पृथक् वर्णन सुनो ॥ १० ॥ विकल्पा बहुधा राजन्नापदां पाण्डुनन्दन । सामादिभिरुपन्यस्य गणयेत् तान् नृपः सदा ॥ ११ ॥ राजन्! पाण्डुनन्दन! उन आपत्तियोंके अनेक प्रकारके विकल्प हैं। राजा साम आदि उपायोंद्वारा उन सबको सामने लाकर सदा गिने ॥ ११ ॥ यात्रां गच्छेद बलैर्युक्तो राजा सद्भिः परंतप । युक्तश्च देशकालाभ्यां बलैरात्मगुणैस्तथा ॥ १२ ॥ परंतप नरेश! देश-कालकी अनुकूलता होनेपर सैनिक-बल तथा राजोचित गुणोंसे युक्त राजा अच्छी सेना साथ लेकर विजयके लिये यात्रा करे ॥ १२ ॥ हृष्टपुष्टबलो गच्छेद राजा वृद्धयुदये रतः । अकृशश्चाप्यथो यायादनृतावपि पाण्डव ॥ १३ ॥ पाण्डुनन्दन! अपने अभ्युदयके लिये तत्पर रहनेवाला राजा यदि दुर्बल न हो और उसकी सेना हृष्ट-पुष्ट हो तो वह युद्धके अनुकूल मौसम न होनेपर भी शत्रुपर चढ़ाई करे ॥ १३ ॥ तूणाश्मानं वाजिरथप्रवाहां ध्वजद्रुमैः संवृतकूलरोधसम् । पदातिनागैर्बहुकर्दमां नदीं