महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2285, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसपत्ननाशे नृपतिः प्रयोजयेत् ॥ १४ ॥ शत्रुओंके विनाशके लिये राजा अपनी सेनारूपी नदीका प्रयोग करे। जिसमें तरकस ही प्रस्तरखण्डके समान हैं, घोड़े और रथरूपी प्रवाह शोभा पाते हैं, जिसका कूल-किनारा ध्वजरूपी वृक्षोंसे आच्छादित है तथा पैदल और हाथी जिसके भीतर अगाध पंकके समान जान पड़ते हैं ॥ १४ ॥
अथोपपत्त्या शकटं पद्मवज्रं च भारत । उशना वेद यच्छास्त्रं तत्रैतद् विहितं विभो ॥ १५ ॥ भारत! युद्धके समय युक्ति करके सेनाका शकट, पद्म अथवा वज्र नामक व्यूह बना ले। प्रभो! शुक्राचार्य जिस शास्त्रको जानते हैं, उसमें ऐसा ही विधान मिलता है ॥ १५ ॥
चारयित्वा परबलं कृत्वा स्वबलदर्शनम् । स्वभूमौ योजयेद् युद्धं परभूमौ तथैव च ॥ १६ ॥ गुप्तचरोंद्वारा शत्रुसेनाकी जाँच-पड़ताल करके अपनी सैनिक-शक्तिका भी निरीक्षण करे। फिर अपनी या शत्रु की भूमिपर युद्ध आरम्भ करे ॥ १६ ॥
बलं प्रसादयेद् राजा निक्षिपेद् बलिनो नरान् । ज्ञात्वा स्वविषयं तत्र सामादिभिरुपक्रमेत् ॥ १७ ॥ राजाको चाहिये कि वह पारितोषिक आदिके द्वारा सेनाको संतुष्ट रखे और उसमें बलवान् मनुष्योंकी भर्ती करे। अपने बलाबलको अच्छी तरह समझकर साम आदि उपायोंके द्वारा संधि या युद्धके लिये उद्योग करे ॥ १७ ॥
सर्वथैव महाराज शरीरं धारयेदिह । प्रेत्य चेह च कर्तव्यमात्मनिःश्रेयसं परम् ॥ १८ ॥ महाराज! इस जगत्में सभी उपायोंद्वारा शरीरकी रक्षा करनी चाहिये और उसके द्वारा इहलोक तथा परलोकमें भी अपने कल्याणका उत्तम साधन करना उचित है ॥ १८ ॥
एवमेतन्महाराज राजा सम्यक् समाचरन् । प्रेत्य स्वर्गमवाप्नोति प्रजा धर्मेण पालयन् ॥ १९ ॥ महाराज! जो राजा इन सब बातोंका विचार करके इनके अनुसार ठीक-ठीक आचरण और प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करता है, वह मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें जाता है ॥ १९ ॥
एवं त्वया कुरुश्रेष्ठ वर्तितव्यं प्रजाहितम् । उभयोर्लोकयोस्तात प्राप्तये नित्यमेव हि ॥ २० ॥ तात! कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार तुम्हें इहलोक और परलोकमें सुख पानेके लिये सदा ही प्रजावर्गके हित-साधनमें संलग्न रहना चाहिये ॥ २० ॥
भीष्मेण सर्वमुक्तोऽसि कृष्णेन विदुरेण च । मयाप्यवश्यं वक्तव्यं प्रीत्या ते नृपसत्तम ॥ २१ ॥