महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 232, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मा भवश्च विष्णुश्च स्कन्देन्द्रौ सविता यमः । वरुणेन्दू मनुर्धाता विधाता त्वं धनेश्वरः ॥ २२ ॥ ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, इन्द्र, सूर्य, यम, वरुण, चन्द्रमा, मनु, धाता, विधाता और धनाध्यक्ष कुबेर भी आप ही हैं ॥ २२ ॥ भूर्वायुः सलिलाग्निश्च खं वाग्बुद्धिः स्थितिर्मतिः । कर्म सत्यानृते चोभे त्वमेवास्ति च नास्ति च ॥ २३ ॥ पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि, आकाश, वाणी, बुद्धि, स्थिति, मति, कर्म, सत्य, असत्य तथा अस्ति और नास्ति भी आप ही हैं ॥ २३ ॥ इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्च प्रकृतिभ्यः परं ध्रुवम् । विश्वाविश्वपरोभावश्चिन्त्याचिन्त्यस्त्वमेव हि ॥ २४ ॥ आप ही इन्द्रियाँ और इन्द्रियोंके विषय हैं। आप ही प्रकृतिसे परे निश्चल एवं अविनाशी तत्त्व हैं। आप ही विश्व और अविश्व—दोनोंसे परे विलक्षण भाव हैं तथा आप ही चिन्त्य और अचिन्त्य हैं ॥ २४ ॥ यच्चैतत् परमं ब्रह्म यच्च तत् परमं पदम् । या गतिः सांख्ययोगानां स भवान् नात्र संशयः ॥ २५ ॥ जो यह परम ब्रह्म है, जो वह परमपद है तथा जो सांख्यवेत्ताओं और योगियोंकी गति है, वह आप ही हैं—इसमें संशय नहीं है ॥ २५ ॥ नूनमद्य कृतार्थाः स्म नूनं प्राप्ताः सतां गतिम् । यां गतिं प्रार्थयन्तीह ज्ञाननिर्मलबुद्धयः ॥ २६ ॥ ज्ञानसे निर्मल बुद्धिवाले ज्ञानी पुरुष यहाँ जिस गतिको प्राप्त करना चाहते हैं, सत्पुरुषोंकी उसी गतिको निश्चित रूपसे हम प्राप्त हो गये हैं; अतः आज हम निश्चय ही कृतार्थ हो गये ॥ २६ ॥ अहो मूढाः स्म सुचिरमिमं कालमचेतसा । यन्न विद्मः परं देवं शाश्वतं यं विदुर्बुधाः ॥ २७ ॥ अहो, हम अज्ञानवश इतने दीर्घकालतक मोहमें पड़े रहे हैं, क्योंकि जिन्हें विद्वान् पुरुष जानते हैं, उन्हीं सनातन परमदेवको हम अबतक नहीं जान सके थे ॥ २७ ॥ सेयमासादिता साक्षात् त्वद्भक्तिर्जन्मभिर्मया । भक्तानुग्रहकृद् देवो यं ज्ञात्वामृतमश्नुते ॥ २८ ॥ अब अनेक जन्मोंके प्रयत्नसे मैंने यह साक्षात् आपकी भक्ति प्राप्त की है। आप ही भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले महान् देवता हैं, जिन्हें जानकर ज्ञानी पुरुष मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं ॥ २८ ॥ देवासुरमुनीनां तु यच्च गुह्यं सनातनम् । गुहायां निहितं ब्रह्म दुर्विज्ञेयं मुनेरपि ॥ २९ ॥