भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 233, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 233

स एष भगवान् देवः सर्वकृत् सर्वतोमुखः । सर्वात्मा सर्वदर्शी च सर्वगः सर्ववेदिता ॥ ३० ॥ जो सनातन ब्रह्म देवताओं, असुरों और मुनियोंके लिये भी गुह्य है, जो हृदयगुहामें स्थित रहकर मननशील मुनिके लिये भी दुर्विज्ञेय बने हुए हैं, वही ये भगवान् हैं। ये ही सबकी सृष्टि करनेवाले देवता हैं। इनके सब ओर मुख हैं। ये सर्वात्मा, सर्वदर्शी, सर्वव्यापी और सर्वज्ञ हैं ॥ २९-३० ॥ देहकृद् देहभृद् देही देहभुग्देहिनां गतिः । प्राणकृत् प्राणभृत् प्राणी प्राणदः प्राणिनां गतिः ॥ ३१ ॥ आप शरीरके निर्माता और शरीरधारी हैं, इसीलिये देही कहलाते हैं। देहके भोक्ता और देहधारियोंकी परम गति हैं। आप ही प्राणोंके उत्पादक, प्राणधारी, प्राणी, प्राणदाता तथा प्राणियोंकी गति हैं ॥ ३१ ॥ अध्यात्मगतिरिष्टानां ध्यायिनामात्मवेदिनाम् । अपुनर्भवकामानां या गतिः सोऽयमीश्वरः ॥ ३२ ॥ ध्यान करनेवाले प्रियभक्तोंकी जो अध्यात्मगति हैं तथा पुनर्जन्मकी इच्छा न रखनेवाले आत्मज्ञानी पुरुषोंकी जो गति बतायी गयी है, वह ये ईश्वर ही हैं ॥ ३२ ॥ अयं च सर्वभूतानां शुभाशुभगतिप्रदः । अयं च जन्ममरणे विदध्यात् सर्वजन्तुषु ॥ ३३ ॥ ये ही समस्त प्राणियोंको शुभ और अशुभ गति प्रदान करनेवाले हैं। ये ही समस्त प्राणियोंको जन्म और मृत्यु प्रदान करते हैं ॥ ३३ ॥ अयं संसिद्धिकामानां या गतिः सोऽयमीश्वरः । भूराद्यान् सर्वभुवनानुत्पाद्य सदिवौकसः । दधाति देवस्तनुभिरष्टाभिर्यो बिभर्ति च ॥ ३४ ॥ संसिद्धि (मुक्ति)-की इच्छा रखनेवाले पुरुषोंकी जो परम गति है, वह ये ईश्वर ही हैं। देवताओंसहित भू आदि समस्त लोकोंको उत्पन्न करके ये महादेव ही (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, सूर्य, चन्द्र, यजमान—इन) अपनी आठ मूर्तियोंद्वारा उनका धारण और पोषण करते हैं ॥ ३४ ॥ अतः प्रवर्तते सर्वमस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् । अस्मिंश्च प्रलयं याति अयमेकः सनातनः ॥ ३५ ॥ इन्हींसे सबकी उत्पत्ति होती है और इन्हींमें सारा जगत् प्रतिष्ठित है और इन्हींमें सबका लय होता है। ये ही एक सनातन पुरुष हैं ॥ ३५ ॥ अयं स सत्यकामानां सत्यलोकः परं सताम् । अपवर्गश्च मुक्तानां कैवल्यं चात्मवेदिनाम् ॥ ३६ ॥