भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2321, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2321

सोऽब्रवीन्मातरं कुन्तीं वनं तमनुजग्मुषीम् । अहं राजानमन्विष्ये भवती विनिवर्तताम् ॥ ७ ॥ वधूपरिवृता राज्ञि नगरं गन्तुमर्हसि । राजा यात्वेष धर्मात्मा तापस्ये कृतनिश्चयः ॥ ८ ॥ उस समय उन्होंने वनकी ओर जाती हुई अपनी माता कुन्तीसे कहा—'रानी मा! आप अपनी पुत्र-वधुओंके साथ लौटिये, नगरको जाइये। मैं राजाके पीछे-पीछे जाऊँगा; क्योंकि ये धर्मात्मा नरेश तपस्याके लिये निश्चय करके वनमें जा रहे हैं, अतः इन्हें जाने दीजिये' ॥ इत्युक्ता धर्मराजेन बाष्पव्याकुललोचना । जगामैव तदा कुन्ती गान्धारीं परिगृह्य ह ॥ ९ ॥ धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर कुन्तीके नेत्रोंमें आँसू भर आया तो भी वे गान्धारीका हाथ पकड़े चलती ही गयीं ॥ ९ ॥

कुन्त्युवाच सहदेवे महाराज माप्रसादं कृथाः क्वचित् । एष मामनुरक्तो हि राजंस्त्ववां चैव सर्वदा ॥ १० ॥ जाते-जाते ही कुन्तीने कहा—महाराज! तुम सहदेवपर कभी अप्रसन्न न होना। राजन्! यह सदा मेरे और तुम्हारे प्रति भक्ति रखता आया है ॥ १० ॥ कर्णं स्मरेथाः सततं संग्रामेष्वपलायिनम् । अवकीर्णो हि समरे वीरो दुष्प्रज्ञया तदा ॥ ११ ॥ संग्राममें कभी पीठ न दिखानेवाले अपने भाई कर्णको भी सदा याद रखना, क्योंकि मेरी ही दुर्बुद्धिके कारण वह वीर युद्धमें मारा गया ॥ ११ ॥ आयसं हृदयं नूनं मन्दाया मम पुत्रक । यत् सूर्यजमपश्यन्त्याः शतधा न विदीर्यते ॥ १२ ॥ बेटा! मुझ अभागिनीका हृदय निश्चय ही लोहेका बना हुआ है; तभी तो आज सूर्यनन्दन कर्णको न देखकर भी इसके सैकड़ों टुकड़े नहीं हो जाते ॥ १२ ॥ एवं गते तु किं शक्यं मया कर्तुमरिंदम । मम दोषोऽयमत्यर्थं ख्यापितो यन्न सूर्यजः ॥ १३ ॥ शत्रुदमन! ऐसी दशामें मैं क्या कर सकती हूँ। यह मेरा ही महान् दोष है कि मैंने सूर्यपुत्र कर्णका तुमलोगोंको परिचय नहीं दिया ॥ १३ ॥ तन्निमित्तं महाबाहो दानं दद्यास्त्वमुत्तमम् । सदैव भ्रातृभिः सार्धं सूर्यजस्यारिमर्दन ॥ १४ ॥ महाबाहो! शत्रुमर्दन! तुम अपने भाइयोंके साथ सदा ही सूर्यपुत्र कर्णके लिये भी उत्तम दान देते रहना ॥ १४ ॥