महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2322, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्रौपद्याश्च प्रिये नित्यं स्थातव्यमरिकर्शन । भीमसेनोऽर्जुनश्चैव नकुलश्च कुरूद्वह ।। १५ ।। समाधेयास्त्वया राजंस्त्वय्यद्य कुलधूर्गता । शत्रुसूदन! मेरी बहू द्रौपदीका भी सदा प्रिय करते रहना। कुरुश्रेष्ठ! तुम भीमसेन, अर्जुन और नकुलको भी सदा संतुष्ट रखना। आजसे कुरुकुलका भार तुम्हारे ही ऊपर है ।। १५१/२ ।।
श्वश्रूश्वशुरयोः पादान् शुश्रूषन्ती वने त्वहम् ।। १६ ।। गान्धारीसहिता वत्स्ये तापसी मलपङ्किनी । अब मैं वनमें गान्धारीके साथ शरीरपर मैल एवं कीचड़ धारण किये तपस्विनी बनकर रहूँगी और अपने इन सास-ससुरके चरणोंकी सेवामें लगी रहूँगी ।। १६१/२ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तः स धर्मात्मा भ्रातृभिः सहितो वशी । विषादमगमद् धीमान् न च किंचिदुवाच ह ।। १७ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! माताके ऐसा कहनेपर अपने मनको वशमें रखनेवाले धर्मात्मा एवं बुद्धिमान् युधिष्ठिर भाइयोंसहित बहुत दुःखी हुए। वे अपने मुँहसे कुछ न बोले ।। १७ ।।
मुहूर्तमिव तु ध्यात्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः । उवाच मातरं दीनश्चिन्ताशोकपरायणः ।। १८ ।। दो घड़ीतक कुछ सोच-विचारकर चिन्ता और शोकमें डूबे हुए धर्मराज युधिष्ठिरने मातासे दीन होकर कहा— ।। १८ ।।
किमिदं ते व्यवसितं नैवं त्वं वक्तुमर्हसि । न त्वामभ्यनुजानामि प्रसादं कर्तुमर्हसि ।। १९ ।। 'माताजी! आपने यह क्या निश्चय कर लिया? आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। मैं आपको वनमें जानेकी अनुमति नहीं दे सकता। आप मुझपर कृपा कीजिये ।। १९ ।।
पुरोद्यतान् पुरा ह्यस्मानुत्साह्य प्रियदर्शने । विदुलाया वचोभिस्त्वं नास्मान् संत्यक्तुमर्हसि ।। २० ।। 'प्रियदर्शने! पहले जब हमलोग नगरसे बाहर जानेको उद्यत थे, आपने विदुलाके वचनोंद्वारा हमें क्षत्रियधर्मके पालनके लिये उत्साह दिलाया था। अतः आज हमें त्यागकर जाना आपके लिये उचित नहीं है ।। २० ।।
निहत्य पृथिवीपालान् राज्यं प्राप्तमिदं मया । तव प्रज्ञामुपश्रुत्य वासुदेवान्नरर्षभात् ।। २१ ।।