महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2323, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें'पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णके मुखसे आपका विचार सुनकर ही मैंने बहुत-से राजाओंका संहार करके इस राज्यको प्राप्त किया है ॥ २१ ॥ क्व सा बुद्धिरियं चाद्य भवत्या यच्छ्रुतं मया । क्षत्रधर्मे स्थितिं चोक्त्वा तस्याश्च्यवितुमिच्छसि ॥ २२ ॥ 'कहाँ आपकी वह बुद्धि और कहाँ आपका यह विचार? मैंने आपका जो विचार सुना है, उसके अनुसार हमें क्षत्रिय-धर्ममें स्थित रहनेका उपदेश देकर आप स्वयं उससे गिरना चाहती हैं ॥ २२ ॥ अस्मानुत्सृज्य राज्यं च स्नुषा हीमा यशस्विनि । कथं वत्स्यसि दुर्गेषु वनेष्वद्य प्रसीद मे ॥ २३ ॥ 'यशस्विनी मा! भला आप हमको, अपनी इन बहुओंको और इस राज्यको छोड़कर अब उन दुर्गम वनोंमें कैसे रह सकेंगी; अतः हमलोगोंपर कृपा करके यहीं रहिये' ॥ २३ ॥ इति बाष्पकला वाचः कुन्ती पुत्रस्य शृण्वती । सा जगामाश्रुपूर्णाक्षी भीमस्तामिदमब्रवीत् ॥ २४ ॥ अपने पुत्रके ये अश्रुगद्गद वचन सुनकर कुन्तीके नेत्रोंमें आँसू उमड़ आये तो भी वे रुक न सकीं। आगे बढ़ती ही गयीं। तब भीमसेनने उनसे कहा— ॥ २४ ॥ यदा राज्यमिदं कुन्ति भोक्तव्यं पुत्रनिर्जितम् । प्राप्तव्या राजधर्मांश्च तदेयं ते कुतो मतिः ॥ २५ ॥ 'माताजी! जब पुत्रोंके जीते हुए इस राज्यके भोगनेका अवसर आया और राजधर्मके पालनकी सुविधा प्राप्त हुई, तब आपको ऐसी बुद्धि कैसे हो गयी? ॥ २५ ॥ किं वयं कारिताः पूर्वं भवत्या पृथिवीक्षयम् । कस्य हेतोः परित्यज्य वनं गन्तुमभीप्ससि ॥ २६ ॥ 'यदि ऐसा ही करना था तो आपने इस भूमण्डलका विनाश क्यों करवाया? क्या कारण है कि आप हमें छोड़कर वनमें जाना चाहती हैं? ॥ २६ ॥ वनाच्चापि किमानीता भवत्या बालका वयम् । दुःखशोकसमाविष्टौ माद्रीपुत्राविमौ तथा ॥ २७ ॥ 'जब आपको वनमें ही जाना था, तब आप हमको और दुःख-शोकमें डूबे हुए उन माद्रीकुमारोंको बाल्यावस्थामें वनसे नगरमें क्यों ले आयीं? ॥ २७ ॥ प्रसीद मातर्मा गास्त्वं वनमद्य यशस्विनि । श्रियं यौधिष्ठिरीं मातर्भुङ्क्ष्व तावद् बलार्जिताम् ॥ २८ ॥ 'मेरी यशस्विनी मा! आप प्रसन्न हों। आप हमें छोड़कर वनमें न जायँ। बलपूर्वक प्राप्त की हुई राजा युधिष्ठिरकी उस राजलक्ष्मीका उपभोग करें' ॥ २८ ॥ इति सा निश्चिताैवाशु वनवासाय भाविनी । लालप्यतां बहुविधं पुत्राणां नाकरोद् वचः ॥ २९ ॥