भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 237, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 237

तप्यतां या गतिर्देव परमा सा गतिर्भवान् ॥ ६१ ॥ देव! उत्तम योग-जप तथा शरीरको सुखा देनेवाले नियमोंद्वारा जो शान्ति मिलती है और तपस्या करनेवाले पुरुषोंको जो दिव्य गति प्राप्त होती है, वह परम गति आप ही हैं ॥ ६१ ॥

कर्मन्यासकृतानां च विरक्तानां ततस्ततः । या गतिर्ब्रह्मसदने सा गतिस्त्वं सनातन ॥ ६२ ॥ सनातन देव! कर्म-संन्यासियोंको और विरक्तोंको ब्रह्मलोकमें जो उत्तम गति प्राप्त होती है, वह आप ही हैं ॥ ६२ ॥

अपुनर्भवकामानां वैराग्ये वर्ततां च या । प्रकृतीनां लयानां च सा गतिस्त्वं सनातन ॥ ६३ ॥ सनातन परमेश्वर! जो मोक्षकी इच्छा रखकर वैराग्यके मार्गपर चलते हैं उन्हें, और जो प्रकृतिमें लयको प्राप्त होते हैं उन्हें, जो गति उपलब्ध होती है, वह आप ही हैं ॥ ६३ ॥

ज्ञानविज्ञानयुक्तानां निरुपाख्या निरञ्जना । कैवल्या या गतिर्देव परमा सा गतिर्भवान् ॥ ६४ ॥ देव! ज्ञान और विज्ञानसे युक्त पुरुषोंको जो सारूप्य आदि नामसे रहित, निरञ्जन एवं कैवल्यरूप परमगति प्राप्त होती है, वह आप ही हैं ॥ ६४ ॥

वेदशास्त्रपुराणोक्ताः पञ्चैता गतयः स्मृताः । त्वत्प्रसादाद्धि लभ्यन्ते न लभ्यन्तेऽन्यथा विभो ॥ ६५ ॥ प्रभो! वेद-शास्त्र और पुराणोंमें जो ये पाँच गतियाँ बतायी गयी हैं, ये आपकी कृपासे ही प्राप्त होती हैं, अन्यथा नहीं ॥ ६५ ॥

इति तण्डिस्तपोराशिस्तुष्टावेशानमात्मना । जगौ च परमं ब्रह्म यत् पुरा लोककृज्जगौ ॥ ६६ ॥ इस प्रकार तपस्याकी निधिरूप तण्डिने अपने मनसे महादेवजीकी स्तुति की और पूर्वकालमें ब्रह्माजीने जिस परम ब्रह्मस्वरूप स्तोत्रका गान किया था, उसीका स्वयं भी गान किया ॥ ६६ ॥

उपमन्युरुवाच

एवं स्तुतो महादेवस्तण्डिना ब्रह्मवादिना । उवाच भगवान् देव उमया सहितः प्रभुः ॥ ६७ ॥ उपमन्यु कहते हैं—ब्रह्मवादी तण्डिके इस प्रकार स्तुति करनेपर पार्वतीसहित प्रभावशाली भगवान् महादेव उनसे बोले— ॥ ६७ ॥

ब्रह्मा शतक्रतुर्विष्णुर्विश्वेदेवा महर्षयः । न विदुस्त्वामिति ततस्तुष्टः प्रोवाच तं शिवः ॥ ६८ ॥