भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 238, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 238

तण्डिने स्तुति करते हुए यह बात कही थी कि 'ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, विश्वेदेव और महर्षि भी आपको यथार्थरूपसे नहीं जानते हैं', इससे भगवान् शंकर बहुत संतुष्ट हुए और बोले — ॥ ६८ ॥

श्रीभगवानुवाच

अक्षयश्चाव्ययश्चैव भविता दुःखवर्जितः । यशस्वी तेजसा युक्तो दिव्यज्ञानसमन्वितः ॥ ६९ ॥ भगवान् श्रीशिवने कहा— ब्रह्मन्! तुम अक्षय, अविकारी, दुःखरहित, यशस्वी, तेजस्वी एवं दिव्यज्ञानसे सम्पन्न होओगे ॥ ६९ ॥

ऋषीणामभिगम्यश्च सूत्रकर्ता सुतस्तव । मत्प्रसादाद् द्विजश्रेष्ठ भविष्यति न संशयः ॥ ७० ॥ कं वा कामं ददाम्यद्य ब्रूहि यद् वत्स काङ्क्षसे । द्विजश्रेष्ठ! मेरी कृपासे तुम्हें एक विद्वान् पुत्र प्राप्त होगा, जिसके पास ऋषिलोग भी शिक्षा ग्रहण करनेके लिये जायँगे। वह कल्पसूत्रका निर्माण करेगा, इसमें संशय नहीं है। वत्स! बोलो, तुम क्या चाहते हो? अब मैं तुम्हें कौन-सा मनोवांछित वर प्रदान करूँ? ॥ ७० ॥

प्राञ्जलिः स उवाचेदं त्वयि भक्तिर्दृढास्तु मे ॥ ७१ ॥ तब तण्डिने हाथ जोड़कर कहा—'प्रभो! आपके चरणारविन्दमें मेरी सुदृढ़ भक्ति हो' ॥ ७१ ॥

उपमन्युरुवाच

एतान् दत्त्वा वरान् देवो वन्द्यमानः सुरर्षिभिः । स्तूयमानश्च विबुधैस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ७२ ॥ उपमन्युने कहा— देवर्षियोंद्वारा वन्दित और देवताओंद्वारा प्रशंसित होते हुए महादेवजी इन वरोंको देकर वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ७२ ॥

अन्तर्हिते भगवति सानुगे यादवेश्वर । ऋषिराश्रममागम्य ममैतत् प्रोक्तवानिह ॥ ७३ ॥ यादवेश्वर! जब पार्षदोंसहित भगवान् अन्तर्धान हो गये, तब ऋषिने मेरे आश्रमपर आकर यहाँ मुझसे ये सब बातें बतायीं ॥ ७३ ॥

यानि च प्रथितान्यादौ तण्डिराख्यातवान् मम । नामानि मानवश्रेष्ठ तानि त्वं शृणु सिद्धये ॥ ७४ ॥ मानवश्रेष्ठ! तण्डिमुनिने जिन आदिकालके प्रसिद्ध नामोंका मेरे सामने वर्णन किया, उन्हें आप भी सुनिये। वे सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं ॥ ७४ ॥

दशनामसहस्राणि देवेष्वाह पितामहः ।