महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2373, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंवैचित्रवीर्यके क्षेत्रे जातः स सुमहामतिः ॥ १५ ॥ ‘मैंने पूर्वकालमें ब्रह्माजीकी आज्ञाके अनुसार अपने तपोबलसे विचित्रवीर्यके क्षेत्र (भार्या) में उस परम बुद्धिमान् विदुरको उत्पन्न किया था ॥ १५ ॥
भ्राता तव महाराज देवदेवः सनातनः । धारणान्मनसा ध्यानाद् यं धर्मं कवयो विदुः ॥ १६ ॥ ‘महाराज! तुम्हारे भाई विदुर देवताओंके भी देवता सनातन धर्म थे। मनके द्वारा धर्मका धारण और ध्यान किया जाता है, इसलिये विद्वान् पुरुष उन्हें धर्मके नामसे जानते हैं ॥
सत्येन संवर्धयति यो दमेन शमेन च । अहिंसया च दानेन तप्यमानः सनातनः ॥ १७ ॥ ‘जो सत्य, इन्द्रियसंयम, मनोनिग्रह, अहिंसा और दानके रूपमें सेवित होनेपर जगत्के अभ्युदयका साधक होता है, वह सनातन धर्म विदुरसे भिन्न नहीं है ॥ १७ ॥
येन योगबलाज्जातः कुरुराजो युधिष्ठिरः । धर्म इत्येष नृपते प्राज्ञेनामितबुद्धिना ॥ १८ ॥ ‘जिस अमित बुद्धिमान् और प्राज्ञ देवताने योगबलसे कुरुराज युधिष्ठिरको जन्म दिया था, वह धर्म विदुरका ही स्वरूप है ॥ १८ ॥
यथा वह्निर्यथा वायुर्यथाऽऽपः पृथिवी यथा। यथाऽऽकाशं तथा धर्म इह चामुत्र च स्थितः ॥ १९ ॥ ‘जैसे अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाशकी सत्ता इहलोक और परलोकमें भी है, उसी प्रकार धर्म भी उभय लोकमें व्याप्त है ॥ १९ ॥
सर्वगश्चैव राजेन्द्र सर्वं व्याप्य चराचरम् । दृश्यते देवदेवैः स सिद्धैर्निर्मुक्तकल्मषैः ॥ २० ॥ ‘राजेन्द्र! धर्मकी सर्वत्र गति है तथा वह सम्पूर्ण चराचर जगत्को व्याप्त करके स्थित है। जिनके समस्त पाप धुल गये हैं, वे सिद्ध पुरुष तथा देवताओंके देवता ही धर्मका साक्षात्कार करते हैं ॥ २० ॥
यो हि धर्मः स विदुरो विदुरो यः स पाण्डवः । स एष राजन् दृश्यस्ते पाण्डवः प्रेष्यवत् स्थितः ॥ २१ ॥ ‘जिन्हें धर्म कहते हैं वे ही विदुर थे और जो विदुर थे, वे ही ये पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर हैं, जो इस समय तुम्हारे सामने दासकी भाँति खड़े हैं ॥ २१ ॥
प्रविष्टः स महात्मानं भ्राता ते बुद्धिसत्तमः । दृष्ट्वा महात्मा कौन्तेयं महायोगबलान्वितः ॥ २२ ॥ ‘महान् योगबलसे सम्पन्न और बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ तुम्हारे भाई महात्मा विदुर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको सामने देखकर इन्हींके शरीरमें प्रविष्ट हो गये हैं ॥ २२ ॥