महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2374, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्वां चापि श्रेयसा योक्ष्ये न चिराद् भरतर्षभ । संशयच्छेदनाथार्यं प्राप्तं मां विद्धि पुत्रक ॥ २३ ॥ ‘भरतश्रेष्ठ! अब तुम्हें भी मैं शीघ्र ही कल्याणका भागी बनाऊँगा। बेटा! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि इस समय मैं तुम्हारे संशयोंका निवारण करनेके लिये आया हूँ ॥ २३ ॥ न कृतं यैः पुरा कैश्चित् कर्म लोके महर्षिभिः । आश्चर्यभूतं तपसः फलं तद् दर्शयामि वः ॥ २४ ॥ ‘पूर्वकालके किन्हीं महर्षियोंने संसारमें अबतक जो चमत्कारपूर्ण कार्य नहीं किया था, वह भी आज मैं कर दिखाऊँगा। आज मैं तुम्हें अपनी तपस्याका आश्चर्यजनक फल दिखलाता हूँ ॥ २४ ॥ किमिच्छसि महीपाल मत्तः प्राप्तुमभीप्सितम् । द्रष्टुं स्प्रष्टुमथ श्रोतुं तत्कर्ताऽस्मि तवानघ ॥ २५ ॥ ‘निष्पाप महीपाल! बताओ, तुम मुझसे कौन-सी अभीष्ट वस्तु पाना चाहते हो? किसको देखने, सुनने अथवा स्पर्श करनेकी तुम्हारी इच्छा है? मैं उसे पूर्ण करूँगा ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि व्यासवाक्ये अष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें व्यासवाक्यविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥