भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 241

सावधान होकर मेरे मुखसे इसका श्रवण करें। आप परमेश्वर महादेवजीके भक्त हैं; अतः इस शिवस्वरूप स्तोत्रका वरण करें॥ ३—६॥

तेन ते श्रावयिष्यामि यत् तद् ब्रह्म सनातनम् । न शक्यं विस्तरात् कृत्स्नं वक्तुं सर्वस्य केनचित् ॥ ७ ॥ युक्तेनापि विभूतीनामपि वर्षशतैरपि । यस्यादिर्मध्यमन्तं च सुरैरपि न गम्यते ॥ ८ ॥ कस्तस्य शक्नुयाद् वक्तुं गुणान् कात्स्न्र्येन माधव ।

शिवभक्त होनेके ही कारण मैं यह सनातन वेदस्वरूप स्तोत्र आपको सुनाता हूँ। महादेवजीके इस सम्पूर्ण नामसमूहका पूर्णरूपसे विस्तारपूर्वक वर्णन तो कोई कर ही नहीं सकता। कोई व्यक्ति योगयुक्त होनेपर भी भगवान् शिवकी विभूतियोंका सैकड़ों वर्षोंमें भी वर्णन नहीं कर सकता। माधव! जिनके आदि, मध्य और अन्तका पता देवता भी नहीं पाते हैं, उनके गुणोंका पूर्णरूपसे वर्णन कौन कर सकता है? ॥ ७-८½ ॥

किं तु देवस्य महतः संक्षिप्तार्थपदाक्षरम् ॥ ९ ॥ शक्तितश्चरितं वक्ष्ये प्रसादात् तस्य धीमतः । अप्राप्य तु ततोऽनुज्ञां न शक्यः स्तोतुमीश्वरः ॥ १० ॥

परंतु मैं अपनी शक्तिके अनुसार उन बुद्धिमान् महादेवजीकी ही कृपासे संक्षिप्त अर्थ, पद और अक्षरोंसे युक्त उनके चरित्र एवं स्तोत्रका वर्णन करूँगा। उनकी आज्ञा प्राप्त किये बिना उन महेश्वरकी स्तुति नहीं की जा सकती है ॥ ९-१० ॥

यदा तेनाभ्यनुज्ञातः स्तुतो वै स तदा मया । अनादिनिधनस्याहं जगद्योनेर्महात्मनः ॥ ११ ॥ नाम्नां कंचित् समुद्देशं वक्ष्याम्यव्यक्तयोनिनः ।

जब उनकी आज्ञा प्राप्त हुई है, तभी मैंने उनकी स्तुति की है। आदि-अन्तसे रहित तथा जगत्के कारणभूत अव्यक्तयोनि महात्मा शिवके नामोंका कुछ संक्षिप्त संग्रह मैं बता रहा हूँ ॥ ११½ ॥

वरदस्य वरेण्यस्य विश्वरूपस्य धीमतः ॥ १२ ॥ शृणु नाम्नां च यं कृष्ण यदुक्तं पद्मयोनिना ।

श्रीकृष्ण! जो वरदायक, वरेण्य (सर्वश्रेष्ठ), विश्वरूप और बुद्धिमान् हैं, उन भगवान् शिवका पद्मयोनि ब्रह्माजीके द्वारा वर्णित नाम-संग्रह श्रवण करो ॥

दशनामसहस्राणि यान्याह प्रपितामहः ॥ १३ ॥ तानि निर्मथ्य मनसा दध्नो घृतमिवोद्धृतम् ।

प्रपितामह ब्रह्माजीने जो दस हजार नाम बताये थे, उन्हींको मनरूपी मथानीसे मथकर मथे हुए दहीसे घीकी भाँति यह सहस्रनामस्तोत्र निकाला गया है ॥

गिरेः सारं यथा हेम पुष्पसारं यथा मधु ॥ १४ ॥