भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 242

घृतात् सारं यथा मण्डस्तथैतत् सारमुद्धृतम् । जैसे पर्वतका सार सुवर्ण, फूलका सार मधु और घीका सार मण्ड है, उसी प्रकार यह दस हजार नामोंका सार उद्धृत किया गया है ॥ १४ १/२ ॥ सर्वपापापहमिदं चतुर्वेदसमन्वितम् ॥ १५ ॥ प्रयत्नेनाधिगन्तव्यं धार्यं च प्रयतात्मना । माङ्गल्यं पौष्टिकं चैव रक्षोघ्नं पावनं महत् ॥ १६ ॥ यह सहस्रनाम सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला और चारों वेदोंके समन्वयसे युक्त है। मनको वशमें करके प्रयत्नपूर्वक इसका ज्ञान प्राप्त करे और सदा अपने मनमें इसको धारण करे। यह मङ्गलजनक, पुष्टिकारक, राक्षसोंका विनाशक तथा परम पावन है ॥ इदं भक्ताय दातव्यं श्रद्दधानास्तिकाय च । नाश्रद्दधानरूपाय नास्तिकायाजितात्मने ॥ १७ ॥ जो भक्त हो, श्रद्धालु और आस्तिक हो, उसीको इसका उपदेश देना चाहिये। अश्रद्धालु, नास्तिक और अजितात्मा पुरुषको इसका उपदेश नहीं देना चाहिये ॥ यश्चाभ्यसूयते देवं कारणात्मानमीश्वरम् । स कृष्ण नरकं याति सह पूर्वैः सहात्मजैः ॥ १८ ॥ श्रीकृष्ण! जो जगत्के कारणरूप ईश्वर महादेवके प्रति दोषदृष्टि रखता है, वह पूर्वजों और अपनी संतानके सहित नरकमें पड़ता है ॥ १८ ॥ इदं ध्यानमिदं योगमिदं ध्येयमनुत्तमम् । इदं जप्यमिदं ज्ञानं रहस्यमिदमुत्तमम् ॥ १९ ॥ यह सहस्रनामस्तोत्र ध्यान है, यह योग है, यह सर्वोत्तम ध्येय है, यह जपनीय मन्त्र है, यह ज्ञान है और यह उत्तम रहस्य है ॥ १९ ॥ यं ज्ञात्वा अन्तकालेऽपि गच्छेत परमां गतिम् । पवित्रं मङ्गलं मेध्यं कल्याणमिदमुत्तमम् ॥ २० ॥ इदं ब्रह्मा पुरा कृत्वा सर्वलोकपितामहः । सर्वस्तवानां राजत्वे दिव्यानां समकल्पयत् ॥ २१ ॥ तदाप्रभृति चैवायमीश्वरस्य महात्मनः । स्तवराज इति ख्यातो जगत्यमरपूजितः ॥ २२ ॥ जिसको अन्तकालमें भी जान लेनेपर मनुष्य परमगतिको पा लेता है, वह यह सहस्रनामस्तोत्र परम पवित्र, मङ्गलकारक, बुद्धिवर्द्धक, कल्याणमय तथा उत्तम है। सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजीने पूर्वकालमें इस स्तोत्रका आविष्कार करके इसे समस्त दिव्यस्तोत्रोंके राजाके पदपर प्रतिष्ठित किया था। तबसे महात्मा ईश्वर महादेवका यह देवपूजित स्तोत्र संसारमें 'स्तवराज' के नामसे विख्यात हुआ ॥ २०—२२ ॥ ब्रह्मलोकादयं स्वर्गे स्तवराजोऽवतारितः ।