महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2430, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रेषयामास स नरान् विधिज्ञानाप्तकारिणः । गङ्गाद्वारं नरश्रेष्ठो यत्र दग्धोऽभवन्नृपः ॥ १४ ॥ तत्रैव तेषां कृत्यानि गङ्गाद्वारेऽन्वशात् तदा । कर्तव्यानीति पुरुषान् दत्तदेयान्महीपतिः ॥ १५ ॥ नरश्रेष्ठ युधिष्ठिरने जहाँ राजा धृतराष्ट्र दग्ध हुए थे, उस स्थानपर भी हरिद्वारमें विधि-विधानके जाननेवाले विश्वासपात्र मनुष्योंको भेजा और वहीं उनके श्राद्धकर्म करनेकी आज्ञा दी। फिर उन भूपालने उन पुरुषोंको दानमें देनेयोग्य नाना प्रकारकी वस्तुएँ अर्पित कीं ॥
द्वादशेऽहनि तेभ्यः स कृतशौचो नराधिपः । ददौ श्राद्धानि विधिवद् दक्षिणावन्ति पाण्डवः ॥ १६ ॥ शौच-सम्पादनके लिये दशाह आदि कर्म कर लेनेके पश्चात् पाण्डुनन्दन राजा युधिष्ठिरने बारहवें दिन धृतराष्ट्र आदिके उद्देश्यसे विधिवत् श्राद्ध किया तथा उन श्राद्धोंमें ब्राह्मणोंको पर्याप्त दक्षिणाएँ दीं ॥ १६ ॥
धृतराष्ट्रं समुद्दिश्य ददौ स पृथिवीपतिः । सुवर्णं रजतं गाश्च शय्याश्च सुमहाधनाः ॥ १७ ॥ गान्धार्याश्चैव तेजस्वी पृथायाश्च पृथक् पृथक् । संकीर्त्य नामनी राजा ददौ दानमनुत्तमम् ॥ १८ ॥ तेजस्वी राजा युधिष्ठिरने धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्तीके लिये पृथक्-पृथक् उनके नाम ले-लेकर सोना, चाँदी, गौ तथा बहुमूल्य शय्याएँ प्रदान कीं तथा परम उत्तम दान दिया ॥ १७-१८ ॥
यो यदिच्छति यावच्च तावत् स लभते नरः । शयनं भोजनं यानं मणिरत्नमथो धनम् ॥ १९ ॥ यानमाच्छादनं भोगान् दासीश्च समलंकृताः । ददौ राजा समुद्दिश्य तयोर्मात्रोर्महीपतिः ॥ २० ॥ उस समय जो मनुष्य जिस वस्तुको जितनी मात्रामें लेना चाहता, वह उस वस्तुको उतनी ही मात्रामें प्राप्त कर लेता था। राजा युधिष्ठिरने अपनी उन दोनों माताओंके उद्देश्यसे शय्या, भोजन, सवारी, मणि, रत्न, धन, वाहन, वस्त्र, नाना प्रकारके भोग तथा वस्त्राभूषणोंसे विभूषित दासियाँ प्रदान कीं ॥ १९-२० ॥
ततः स पृथिवीपालो दत्त्वा श्राद्धान्यनेकGeneric -> श्राद्धान्यनेकशः । प्रविवेश पुरं राजा नगरं वारणाह्वयम् ॥ २१ ॥ इस प्रकार अनेक बार श्राद्धके दान देकर पृथिवीपाल राजा युधिष्ठिरने हस्तिनापुर नामक नगरमें प्रवेश किया ॥ २१ ॥
ते चापि राजवचनात् पुरुषा ये गताभवन् । संकल्प्य तेषां कुल्यानि पुनः प्रत्यागमंस्ततः ॥ २२ ॥