महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2431, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमाल्यैर्गन्धैश्च विविधैरर्चयित्वा यथाविधि । कुल्यानि तेषां संयोज्य तदाचख्युर्महीपतेः ॥ २३ ॥
जो लोग राजाकी आज्ञासे हरिद्वारमें भेजे गये थे, वे उन तीनोंकी हड्डियोंको संचित करके वहाँसे फिर गंगाजीके तटपर गये। फिर भाँति-भाँतिकी मालाओं और चन्दनोंसे विधिपूर्वक उनकी पूजा की। पूजा करके उन सबको गंगाजीमें प्रवाहित कर दिया। इसके बाद हस्तिनापुरमें लौटकर उन्होंने यह सब समाचार राजाको कह सुनाया ॥ २२-२३ ॥
समाश्र्वास्य तु राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । नारदोऽप्यगमद् राजन् परमर्षिर्यथेप्सितम् ॥ २४ ॥
राजन्! तदनन्तर देवर्षि नारदजी धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरको आश्वासन देकर अभीष्ट स्थानको चले गये ॥
एवं वर्षाण्यतीतानि धृतराष्ट्रस्य धीमतः । वनवासे तथा त्रीणि नगरे दश पञ्च च ॥ २५ ॥ हतपुत्रस्य संग्रामे दानानि ददतः सदा । ज्ञातिसम्बन्धिमित्राणां भ्रातृणां स्वजनस्य च ॥ २६ ॥
इस प्रकार जिनके पुत्र रणभूमिमें मारे गये थे, उन राजा धृतराष्ट्रने अपने जाति-भाई, सम्बन्धी, मित्र, बन्धु और स्वजनोंके निमित्त सदा दान देते हुए (युद्ध समाप्त होनेके बाद) पंद्रह वर्ष हस्तिनापुर नगरमें व्यतीत किये थे और तीन वर्ष वनमें तपस्या करते हुए बिताये थे ॥ २५-२६ ॥
युधिष्ठिरस्तु नृपतिर्नातिप्रीतमनास्तदा । धारयामास तद् राज्यं निहतज्ञातिबान्धवः ॥ २७ ॥
जिनके बन्धु-बान्धव नष्ट हो गये थे, वे राजा युधिष्ठिर मनमें अधिक प्रसन्न न रहते हुए किसी प्रकार राज्यका भार सँभालने लगे ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि नारदागमनपर्वणि श्राद्धदाने एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत नारदागमनपर्वमें श्राद्धदानविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३९ ॥