महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2435, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंबड़ी-बड़ी नदियाँ बालूके भीतर छिपकर बहने लगीं। दिशाएँ कुहरेसे आच्छादित हो गयीं। आकाशसे पृथ्वीपर अंगार बरसानेवाली उल्काएँ गिरने लगीं ॥ आदित्यो रजसा राजन् समवच्छन्नमण्डलः । विरश्मिरुदये नित्यं कबन्धैः समदृश्यत ॥ ४ ॥ राजन्! सूर्यमण्डल धूलसे आच्छन्न हो गया था। उदयकालमें सूर्य तेजोहीन प्रतीत होते थे और उनका मण्डल प्रतिदिन अनेक कबन्धों (बिना सिरके धड़ों)-से युक्त दिखायी देता था ॥ ४ ॥ परिवेषाश्च दृश्यन्ते दारुणाश्चन्द्रसूर्ययोः । त्रिवर्णिः श्यामरूक्षान्तास्तथा भस्मारुणप्रभाः ॥ ५ ॥ चन्द्रमा और सूर्य दोनोंके चारों ओर भयानक घेरे दृष्टिगोचर होते थे। उन घेरोंमें तीन रंग प्रतीत होते थे। उनका किनारेका भाग काला एवं रूखा होता था। बीचमें भस्मके समान धूसर रंग दीखता था और भीतरी किनारेकी कान्ति अरुणवर्णकी दृष्टिगोचर होती थी ॥ ५ ॥ एते चान्ये च बहव उत्पाता भयशंसिनः । दृश्यन्ते बहवो राजन् हृदयोद्वेगकारकाः ॥ ६ ॥ राजन्! ये तथा और भी बहुत-से भयसूचक उत्पात दिखायी देने लगे, जो हृदयको उद्विग्न कर देनेवाले थे ॥ कस्यचित् त्वथ कालस्य कुरुराजो युधिष्ठिरः । शुश्राव वृष्णिचक्रस्य मौसले कदनं कृतम् ॥ ७ ॥ विमुक्तं वासुदेवं च श्रुत्वा रामं च पाण्डवः । समानीयाब्रवीद् भ्रातॄन् किं करिष्याम इत्युत ॥ ८ ॥ इसके थोड़े ही दिनों बाद कुरुराज युधिष्ठिरने यह समाचार सुना कि मूसलको निमित्त बनाकर आपसमें महान् युद्ध हुआ है; जिसमें समस्त वृष्णिवंशियोंका संहार हो गया। केवल भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी ही उस विनाशसे बचे हुए हैं। यह सब सुनकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने अपने समस्त भाइयोंको बुलाया और पूछा—‘अब हमें क्या करना चाहिये? ॥ ७-८ ॥ परस्परं समासाद्य ब्रह्मदण्डबलात् कृतान् । वृष्णीन् विनष्टांस्ते श्रुत्वा व्यथिताः पाण्डवाभवन् ॥ ९ ॥ निधनं वासुदेवस्य समुद्रस्येव शोषणम् । वीरा न श्रद्दधुस्तस्य विनाशं शार्ङ्गधन्वनः ॥ १० ॥ ब्राह्मणोंके शापके बलसे विवश हो आपसमें लड़-भिड़कर सारे वृष्णिवंशी विनष्ट हो गये। यह बात सुनकर पाण्डवोंको बड़ी वेदना हुई। भगवान् श्रीकृष्णका वध तो समुद्रको