महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसोख लेनेके समान असम्भव था; अतः उन वीरोंने भगवान् श्रीकृष्णके विनाशकी बातपर विश्वास नहीं किया ॥ ९-१० ॥
मौसलं ते समाश्रित्य दुःखशोकसमन्विताः ।
विषण्णा हतसंकल्पाः पाण्डवाः समुपाविशन् ॥ ११ ॥
इस मौसलकाण्डकी बातको लेकर सारे पाण्डव दुःख-शोकमें डूब गये। उनके मनमें विषाद छा गया और वे हताश हो मन मारकर बैठ गये ॥ ११ ॥
जनमेजय उवाच
कथं विनष्टा भगवन्नन्धका वृष्णिभिः सह ।
पश्यतो वासुदेवस्य भोजाश्चैव महारथाः ॥ १२ ॥
जनमेजयने पूछा— भगवन्! भगवान् श्रीकृष्णके देखते-देखते वृष्णियोंसहित अन्धक तथा महारथी भोजवंशी क्षत्रिय कैसे नष्ट हो गये? ॥ १२ ॥
वैशम्पायन उवाच
षट्त्रिंशेऽथ ततो वर्षे वृष्णीनामनयो महान् ।
अन्योन्यं मुसलैस्ते तु निजघ्नुः कालचोदिताः ॥ १३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! महाभारतयुद्धके बाद छत्तीसवें वर्ष वृष्णिवंशियोंमें महान् अन्यायपूर्ण कलह आरम्भ हो गया। उसमें कालसे प्रेरित होकर उन्होंने एक-दूसरेको मूसलों (अरों)-से मार डाला ॥ १३ ॥
जनमेजय उवाच
केनानुशप्तास्ते वीराः क्षयं वृष्ण्यन्धका गताः ।
भोजाश्च द्विजवर्य त्वं विस्तरेण वदस्व मे ॥ १४ ॥
जनमेजयने पूछा— विप्रवर! वृष्णि, अन्धक तथा भोजवंशके उन वीरोंको किसने शाप दिया था जिससे उनका संहार हो गया? आप यह प्रसंग मुझे विस्तारपूर्वक बताइये ॥ १४ ॥
वैशम्पायन उवाच
विश्वामित्रं च कण्वं च नारदं च तपोधनम् ।
सारणप्रमुखा वीरा ददृशुर्द्वारकां गतान् ॥ १५ ॥
ते तान् साम्बं पुरस्कृत्य भूषयित्वा स्त्रियं यथा ।
अब्रुवन्नुपसंगम्य दैवदण्डनिपीडिताः ॥ १६ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! एक समयकी बात है, महर्षि विश्वामित्र, कण्व और तपस्याके धनी नारदजी द्वारकामें गये हुए थे। उस समय दैवके मारे हुए सारण आदि वीर