महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2441, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअन्वकुर्वन्नुलूकानां सारसा विरुतं तथा । अजाः शिवानां विरुतमन्वकुर्वत भारत ॥ ७ ॥ भारत! सारस उल्लुओंकी और बकरे गीदड़ोंकी बोलीकी नकल करने लगे ॥ ७ ॥
पाण्डुरा रक्तपादाश्च विहगाः कालचोदिताः । वृष्ण्यन्धकानां गेहेषु कपोता व्यचरंस्तदा ॥ ८ ॥ कालकी प्रेरणासे वृष्णियों और अन्धकोंके घरोंमें सफेद पंख और लाल पैरोंवाले कबूतर घूमने लगे ॥ ८ ॥
व्यजायन्त खरा गोषु करभाऽश्वतरीषु च । शुनीष्वपि बिडालाश्च मूषिका नकुलीषु च ॥ ९ ॥ गौओंके पेटसे गदहे, खच्चरियोंसे हाथी, कुतियोंसे बिलाव और नेवलियोंके गर्भसे चूहे पैदा होने लगे ॥ ९ ॥
नापत्रपन्त पापानि कुर्वन्तो वृष्णयस्तदा । प्राद्विषन् ब्राह्मणांश्चापि पितॄन् देवांस्तथैव च ॥ १० ॥ उन दिनों वृष्णिवंशी खुल्लमखुल्ला पाप करते और उसके लिये लज्जित नहीं होते थे। वे ब्राह्मणों, देवताओं और पितरोंसे भी द्वेष रखने लगे ॥ १० ॥
गुरूंचाप्यवमन्यन्ते न तु रामजनार्दनौ । पत्न्यः पतीनुच्चरन्त पत्नीश्च पतयस्तथा ॥ ११ ॥ इतना ही नहीं, वे गुरुजनोंका भी अपमान करते थे। केवल बलराम और श्रीकृष्णका ही तिरस्कार नहीं करते थे। पत्नियाँ पतियोंको और पति अपनी पत्नियोंको धोखा देने लगे ॥ ११ ॥
विभावसुः प्रज्वलितो वामं विपरिवर्तते । नीललोहितमञ्जिष्ठा विसृजन्नर्चिषः पृथक् ॥ १२ ॥ अग्निदेव प्रज्वलित होकर अपनी लपटोंको वामावर्त घुमाते थे। उनसे कभी नीले रंगकी, कभी रक्तवर्णकी और कभी मजीठके रंगकी पृथक्-पृथक् लपटें निकलती थीं ॥ १२ ॥
उदयास्तमने नित्यं पुर्यां तस्यां दिवाकरः । व्यदृश्यतासकृत् पुम्भिः कबन्धैः परिवारितः ॥ १३ ॥ उस नगरीमें रहनेवाले लोगोंको उदय और अस्तके समय सूर्यदेव प्रतिदिन बारंबार कबन्धोंसे घिरे दिखायी देते थे ॥ १३ ॥
महानसेषु सिद्धेषु संस्कृतेऽतीव भारत । आहार्यमाणे कृमयो व्यदृश्यन्त सहस्रशः ॥ १४ ॥ अच्छी तरह छौंक-बघारकर जो रसोइयाँ तैयार की जाती थीं, उन्हें परोसकर जब लोग भोजनके लिये बैठते थे तब उनमें हजारों कीड़े दिखायी देने लगते थे ॥ १४ ॥