महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2442, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुण्याहे वाच्यमाने तु जपत्सु च महात्मसु । अभिधावन्तः श्रूयन्ते न चादृश्यत कश्चन ॥ १५ ॥ जब पुण्याहवाचन किया जाता और महात्मा पुरुष जप करने लगते थे, उस समय कुछ लोगोंके दौड़नेकी आवाज सुनायी देती थी; परंतु कोई दिखायी नहीं देता था ॥ १५ ॥ परस्परं च नक्षत्रं हन्यमानं पुनः पुनः । ग्रहेरपश्यन् सर्वे ते नात्मनस्तु कथंचन ॥ १६ ॥ सब लोग बारंबार यह देखते थे कि नक्षत्र आपसमें तथा ग्रहोंके साथ भी टकरा जाते हैं, परन्तु कोई भी किसी तरह अपने नक्षत्रको नहीं देख पाता था ॥ १६ ॥ नदन्तं पाञ्चजन्यं च वृष्ण्यन्धकनिवेशने । समन्तात् पर्यवाशन्त रासभा दारुणस्वराः ॥ १७ ॥ जब भगवान् श्रीकृष्णका पाञ्चजन्य शंख बजता था, तब वृष्णियों और अन्धकोंके घरके आस-पास चारों ओर भयंकर स्वरवाले गदहे रेंकने लगते थे ॥ १७ ॥ एवं पश्यन् हृषीकेशः सम्प्राप्तं कालपर्ययम् । त्रयोदश्याममावास्यां तान् दृष्ट्वा प्राब्रवीदिदम् ॥ १८ ॥ इस तरह कालका उलट-फेर प्राप्त हुआ देख और त्रयोदशी तिथिको अमावास्याका संयोग जान भगवान् श्रीकृष्णने सब लोगोंसे कहा— ॥ १८ ॥ चतुर्दशी पञ्चदशी कृतेयं राहुणा पुनः । प्राप्ते वै भारते युद्धे प्राप्ता चाद्य क्षयाय नः ॥ १९ ॥ 'वीरो! इस समय राहुने फिर चतुर्दशीको ही अमावास्या बना दिया है। महाभारतयुद्धके समय जैसा योग था वैसा ही आज भी है। यह सब हमलोगोंके विनाशका सूचक है' ॥ १९ ॥ विमृशन्नेव कालं तं परिचिन्त्य जनार्दनः । मेने प्राप्तं स षट्त्रिंशं वर्षं वै केशिसूदनः ॥ २० ॥ इस प्रकार समयका विचार करते हुए केशिहन्ता श्रीकृष्णने जब उसका विशेष चिन्तन किया, तब उन्हें मालूम हुआ कि महाभारतयुद्धके बाद यह छत्तीसवाँ वर्ष आ पहुँचा ॥ २० ॥ पुत्रशोकाभिसंतप्ता गान्धारी हतबान्धवा । यदनुव्याजहारातीं तदिदं समुपागमत् ॥ २१ ॥ वे बोले—'बन्धु-बान्धवोंके मारे जानेपर पुत्रशोकसे संतप्त हुई गान्धारी देवीने अत्यन्त व्यथित होकर हमारे कुलके लिये जो शाप दिया था उसके सफल होनेका यह समय आ गया है ॥ २१ ॥ इदं च तदनुप्राप्तमब्रवीद् यद् युधिष्ठिरः । पुरा व्यूढेष्वनीकेषु दृष्ट्वोत्पातान् सुदारुणान् ॥ २२ ॥