महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2445, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंउच्चैर्जह्रुरप्सरसो दिवानिशं वाचश्चोचुर्गम्यतां तीर्थयात्रा ॥ ६ ॥ बलराम और श्रीकृष्ण जिनकी सदा पूजा करते थे, उन ताल और गरुड़के चिह्नसे युक्त दोनों विशाल ध्वजोंको अप्सराएँ ऊँचे उठा ले गयीं और दिन-रात लोगोंसे यह बात कहने लगीं कि 'अब तुमलोग तीर्थ-यात्राके लिये निकलो' ॥ ६ ॥
ततो जिगमिषन्तस्ते वृष्ण्यन्धकमहारथाः । सान्तःपुरास्तदा तीर्थयात्रामैच्छन् नरर्षभाः ॥ ७ ॥ तदनन्तर पुरुषश्रेष्ठ वृष्णि और अन्धक महारथियोंने अपनी स्त्रियोंके साथ उस समय तीर्थयात्रा करनेका विचार किया। अब उनमें द्वारका छोड़कर अन्यत्र जानेकी इच्छा हो गयी थी ॥ ७ ॥
ततो भोज्यं च भक्ष्यं च पेयं चान्धकवृष्णयः । बहु नानाविधं चक्रुर्मद्यं मांसमनेकशः ॥ ८ ॥ तब अन्धकों और वृष्णियोंने नाना प्रकारके भक्ष्य, भोज्य, पेय, मद्य और भाँति-भाँतिके मांस तैयार कराये ॥ ८ ॥
ततः सैनिकवर्गाश्च निर्ययुर्नगराद् बहिः । यानैरश्वैर्गजैश्चैव श्रीमन्तस्तिग्मतेजसः ॥ ९ ॥ इसके बाद सैनिकोंके समुदाय, जो शोभासम्पन्न और प्रचण्ड तेजस्वी थे, रथ, घोड़े और हाथियोंपर सवार होकर नगरसे बाहर निकले ॥ ९ ॥
ततः प्रभासे न्यवसन् यथोद्दिष्टं यथागृहम् । प्रभूतभक्ष्यपेयास्ते सदारा यादवास्तदा ॥ १० ॥ उस समय स्त्रियोंसहित समस्त यदुवंशी प्रभासक्षेत्रमें पहुँचकर अपने-अपने अनुकूल घरोंमें ठहर गये। उनके साथ खाने-पीनेकी बहुत-सी सामग्री थी ॥ १० ॥
निविष्टांस्तान् निशम्याथ समुद्रान्ते स योगवित् । जगामामन्त्र्य तान् वीरानुद्धवोऽर्थविशारदः ॥ ११ ॥ परमार्थ ज्ञानमें कुशल और योगवेत्ता उद्धवजीने देखा कि समस्त वीर यदुवंशी समुद्रतटपर डेरा डाले बैठे हैं। तब वे उन सबसे पूछकर—विदा लेकर वहाँसे चल दिये ॥ ११ ॥
तं प्रस्थितं महात्मानमभिवाद्य कृताञ्जलिम् । जानन् विनाशं वृष्णीनां नैच्छद् वारयितुं हरिः ॥ १२ ॥ महात्मा उद्धव भगवान् श्रीकृष्णको हाथ जोड़कर प्रणाम करके जब वहाँसे प्रस्थित हुए तब श्रीकृष्णने उन्हें वहाँ रोकनेकी इच्छा नहीं की; क्योंकि वे जानते थे कि यहाँ ठहरे हुए वृष्णिवंशियोंका विनाश होनेवाला है ॥ १२ ॥
ततः कालपरीतास्ते वृष्ण्यन्धकमहारथाः ।