महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2446, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपश्यन्नुद्धवं यान्तं तेजसाऽऽवृत्य रोदसी ॥ १३ ॥ कालसे घिरे हुए वृष्णि और अन्धक महारथियोंने देखा कि उद्धव अपने तेजसे पृथ्वी और आकाशको व्याप्त करके यहाँसे चले जा रहे हैं ॥ १३ ॥ ब्राह्मणार्थेषु यत् सिद्धमन्नं तेषां महात्मनाम् । तद् वानरेभ्यः प्रददुः सुरागन्धसमन्वितम् ॥ १४ ॥ उन महामनस्वी यादवोंके यहाँ ब्राह्मणोंको जिमानेके लिये जो अन्न तैयार किया गया था उसमें मदिरा मिलाकर उसकी गन्धसे युक्त हुए उस भोजनको उन्होंने वानरोंको बाँट दिया ॥ १४ ॥ ततस्तूर्यशताकीर्णं नटनर्तकसंकुलम् । अवर्तत महापानं प्रभासे तिग्मतेजसाम् ॥ १५ ॥ तदनन्तर वहाँ सैकड़ों प्रकारके बाजे बजने लगे। सब ओर नटों और नर्तकोंका नृत्य होने लगा। इस प्रकार प्रभासक्षेत्रमें प्रचण्ड तेजस्वी यादवोंका वह महापान आरम्भ हुआ ॥ १५ ॥ कृष्णस्य संनिधौ रामः सहितः कृतवर्मणा । अपिबद् युयुधानश्च गदो बभ्रुस्तथैव च ॥ १६ ॥ श्रीकृष्णके पास ही कृतवर्मासहित बलराम, सात्यकि, गद और बभ्रु पीने लगे ॥ १६ ॥ ततः परिषदो मध्ये युयुधानो मदोत्कटः । अब्रवीत् कृतवर्माणमवहास्यावमन्य च ॥ १७ ॥ पीते-पीते सात्यकि मदसे उन्मत्त हो उठे और यादवोंकी उस सभामें कृतवर्माका उपहास तथा अपमान करते हुए इस प्रकार बोले— ॥ १७ ॥ कः क्षत्रियोऽहन्यमानः सुप्तान् हन्यान्मृतानिव । तन्न मृष्यन्ति हार्दिक्य यादवा यत् त्वया कृतम् ॥ १८ ॥ ‘हार्दिक्य! तेरे सिवा दूसरा कौन ऐसा क्षत्रिय होगा जो अपने ऊपर आघात न होते हुए भी रातमें मुर्दोंके समान अचेत पड़े हुए मनुष्योंकी हत्या करेगा। तूने जो अन्याय किया है उसे यदुवंशी कभी क्षमा नहीं करेंगे’ ॥ इत्युक्ते युयुधानेन पूजयामास तद्वचः । प्रद्युम्नो रथिनां श्रेष्ठो हार्दिक्यमवमन्य च ॥ १९ ॥ सात्यकिके ऐसा कहनेपर रथियोंमें श्रेष्ठ प्रद्युम्नने कृतवर्माका तिरस्कार करके सात्यकिके उपर्युक्त वचनकी प्रशंसा एवं अनुमोदन किया ॥ १९ ॥ ततः परमसंक्रुद्धः कृतवर्मा तमब्रवीत् । निर्दिशन्निव सावज्ञं तदा सव्येन पाणिना ॥ २० ॥ यह सुनकर कृतवर्मा अत्यन्त कुपित हो उठा और बायें हाथसे अंगुलिका इशारा करके सात्यकिका अपमान करता हुआ बोला— ॥ २० ॥