भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2465, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2465

विदेहावकरोत् पार्थ चैद्यं च बलगर्वितम् । नैषादिमेकलव्यं च चक्रे कालिङ्गममागधान् ॥ ११ ॥ गान्धारान् काशिराजं च मरुभूमौ च पार्थिवान् । प्राच्यांश्च दाक्षिणात्यांश्च पार्वतियांस्तथा नृपान् ॥ १२ ॥ सोऽभ्युपेक्षितवानेतमनयान्मधुसूदनः । कुन्तीनन्दन! जिन जगदीश्वरने पराक्रम प्रकट करके केशी और कंसको देह-बन्धनसे मुक्त कर दिया। बलका घमंड रखनेवाले चेदिराज शिशुपाल, निषादपुत्र एकलव्य, कलिंगराज, मगधनिवासी क्षत्रिय, गान्धार, काशिराज तथा मरुभूमिके राजाओंको भी यमलोक भेज दिया था, जिन्होंने पूर्व, दक्षिण तथा पर्वतीय प्रान्तके नरेशोंका भी संहार कर डाला था, उन्हीं मधुसूदनने बालकोंकी अनीतिके कारण प्राप्त हुए इस संकटकी उपेक्षा कर दी ॥ १०—१२ १/२ ॥

त्वं हि तं नारदश्चैव मुनयश्च सनातनम् ॥ १३ ॥ गोविन्दमनघं देवमभिजानीध्वमच्युतम् । प्रत्यपश्यच्च स विभुर्ज्ञातीक्षयमधोक्षजः ॥ १४ ॥ तुम, देवर्षि नारद तथा अन्य महर्षि भी श्रीकृष्णको पापके सम्पर्कसे रहित, सनातन, अच्युत परमेश्वररूपसे जानते हैं। वे ही सर्वव्यापी अधोक्षज अपने कुटुम्बीजनोंके इस विनाशको चुपचाप देखते रहे ॥ १३-१४ ॥

समुपेक्षितवान् नित्यं स्वयं स मम पुत्रकः । गान्धार्या वचनं यत् तदृषीणां च परंतप ॥ १५ ॥ तन्नूनमन्यथा कर्तुं नैच्छत् स जगतः प्रभुः । परंतप अर्जुन! मेरे पुत्ररूपमें अवतीर्ण हुए वे जगदीश्वर गान्धारी तथा महर्षियोंके शापको पलटना नहीं चाहते थे, इसीलिये उन्होंने सदा ही इस संकटकी उपेक्षा की ॥ १५ १/२ ॥

प्रत्यक्षं भवतश्चापि तव पौत्रः परंतप ॥ १६ ॥ अश्वत्थाम्ना हतश्चापि जीवितस्तस्य तेजसा । परंतप! तुम्हारा पौत्र परीक्षित् अश्वत्थामाद्वारा मार डाला गया था तो भी श्रीकृष्णके तेजसे वह जीवित हो गया। यह तो तुमलोगोंकी आँखों-देखी घटना है ॥

इमांस्तु नैच्छत् स्वान् ज्ञातीन् रक्षितुं च सखा तव ॥ १७ ॥ ततः पुत्रांश्च पौत्रांश्च भ्रातॄनथ सखींस्तथा । शयानान् निहतान् दृष्ट्वा ततो मामब्रवीदिदम् ॥ १८ ॥ इतने शक्तिशाली होते हुए भी तुम्हारे सखाने अपने इन भाई-बन्धुओंको प्राणसंकटसे बचानेकी इच्छा नहीं की। जब पुत्र, पौत्र, भाई और मित्र सभी एक-दूसरेके हाथसे मरकर