महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2466, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंधराशायी हो गये तब उन्हें उस अवस्थामें देखकर श्रीकृष्ण मेरे पास आये और इस प्रकार बोले— ।। १७-१८ ।।
सम्प्राप्तोऽद्यायमस्यान्तः कुलस्य पुरुषर्षभ ।
आगमिष्यति बीभत्सुरिमां द्वारवतीं पुरीम् ।। १९ ।।
आख्येयं तस्य यद् वृत्तं वृष्णीनां वैशसं महत् ।
‘पुरुषप्रवर पिताजी! आज इस कुलका संहार हो गया। अर्जुन द्वारकापुरीमें आनेवाले हैं। आनेपर उनसे वृष्णिवंशियोंके इस महान् विनाशका वृत्तान्त कहियेगा ।।
स तु श्रुत्वा महातेजा यदूनां निधनं प्रभो ।। २० ।।
आगन्ता क्षिप्रमेवेह न मेऽत्रास्ति विचारणा ।
‘प्रभो! अर्जुनके पास संदेश भी पहुँचा होगा। वे महातेजस्वी कुन्तीकुमार यदुवंशियोंके विनाशका यह समाचार सुनकर शीघ्र ही यहाँ आ पहुँचेंगे। इस विषयमें मेरा कोई अन्यथा विचार नहीं है ।। २० १/२ ।।
योऽहं तमर्जुनं विद्धि योऽर्जुनः सोऽहमेव तु ।। २१ ।।
यद् ब्रूयात् तत् तथा कार्यमिति बुद्ध्यस्व माधव ।
‘जो मैं हूँ उसे अर्जुन समझिये, जो अर्जुन हैं वह मैं ही हूँ। माधव! अर्जुन जो कुछ भी कहें वैसा ही आपलोगोंको करना चाहिये। इस बातको अच्छी तरह समझ लें ।। २१ १/२ ।।
स स्त्रीषु प्राप्तकालासु पाण्डवो बालकेषु च ।। २२ ।।
प्रतिपत्स्यति बीभत्सुर्भवतश्चौर्ध्वदेहिकम् ।
‘जिन स्त्रियोंका प्रसवकाल समीप हो, उनपर और छोटे बालकोंपर अर्जुन विशेषरूपसे ध्यान देंगे और वे ही आपका और्ध्वदेहिक संस्कार भी करेंगे ।। २२ १/२ ।।
इमां च नगरीं सद्यः प्रतियाते धनंजये ।। २३ ।।
प्राकाराट्टालकोपेतां समुद्रः प्लावयिष्यति ।
‘अर्जुनके चले जानेपर चहारदीवारी और अट्टालिकाओं सहित इस नगरीको समुद्र तत्काल डुबो देगा ।। २३ १/२ ।।
अहं देशे तु कस्मिंश्चित् पुण्ये नियममास्थितः ।। २४ ।।
कालं काङ्क्षे सद्य एव रामेण सह धीमता ।
‘मैं किसी पवित्र स्थानमें रहकर शौच-संतोषादि नियमोंका आश्रय ले बुद्धिमान् बलरामजीके साथ शीघ्र ही कालकी प्रतीक्षा करूँगा’ ।। २४ १/२ ।।
एवमुक्त्वा हृषीकेशो मामचिन्त्यपराक्रमः ।। २५ ।।
हित्वा मां बालकैः सार्धं दिशं कामप्यगात् प्रभुः ।
ऐसा कहकर अचित्य पराक्रमी प्रभावशाली श्रीकृष्ण बालकोंके साथ मुझे छोड़कर किसी अज्ञात दिशाको चले गये है ।। २५ १/२ ।।