महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2476, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंआभीरा मन्त्रयामासुः समेत्याशुभदर्शनाः ॥ ४७ ॥ लोभसे उनके चित्तकी विवेकशक्ति नष्ट हो गयी। उन अशुभदर्शी पापाचारी आभीरोंने परस्पर मिलकर सलाह की ॥ ४७ ॥ अयमेकोऽर्जुनो धन्वी वृद्धबालं हतेश्वरम् । नयत्यस्मानतिक्रम्य योधाश्चेमे हतौजसः ॥ ४८ ॥ ‘भाइयो! देखो, यह अकेला धनुर्धर अर्जुन और ये हतोत्साह सैनिक हमलोगोंको लाँघकर वृद्धों और बालकोंके इस अनाथ समुदायको लिये जा रहे हैं (अतः इनपर आक्रमण करना चाहिये)’ ॥ ४८ ॥ ततो यष्टिप्रहरणा दस्यवस्ते सहस्रशः । अभ्यधावन्त वृष्णीनां तं जनं लोप्त्रहारिणः ॥ ४९ ॥ ऐसा निश्चय करके लूटका माल उड़ानेवाले वे लठ्ठधारी लुटेरे वृष्णिवंशियोंके उस समुदायपर हजारोंकी संख्यामें टूट पड़े ॥ ४९ ॥ महता सिंहनादेन त्रासयन्तः पृथग्जनम् । अभिपेतुर्र्वधार्थं ते कालपर्यायचोदिताः ॥ ५० ॥ समयके उलट-फेरसे प्रेरणा पाकर वे लुटेरे उन सबके वधके लिये उतारू हो अपने महान् सिंहनादसे साधारण लोगोंको डराते हुए उनकी ओर दौड़े ॥ ५० ॥ ततो निवृत्तः कौन्तेयः सहसा सपदानुगः । उवाच तान् महाबाहुरर्जुनः प्रहसन्निव ॥ ५१ ॥ आक्रमणकारियोंको पीछेकी ओरसे धावा करते देख कुन्तीकुमार महाबाहु अर्जुन सेवकोंसहित सहसा लौट पड़े और उनसे हँसते हुए-से-बोले— ॥ ५१ ॥ निवर्तध्वमधर्मज्ञा यदि जीवितुमिच्छथ । इदानीं शरनिर्भिन्नाः शोचध्वं निहता मया ॥ ५२ ॥ ‘धर्मको न जाननेवाले पापियो! यदि जीवित रहना चाहते हो तो लौट जाओ; नहीं तो मेरे द्वारा मारे जाकर या मेरे बाणोंसे विदीर्ण होकर इस समय तुम बड़े शोकमें पड़ जाओगे’ ॥ ५२ ॥ तथोक्तास्तेन वीरेण कदर्थीकृत्य तद्वचः । अभिपेतुरर्जुनं मूढा वार्यमाणाः पुनः पुनः ॥ ५३ ॥ वीरवर अर्जुनके ऐसा कहनेपर उनकी बातोंकी अवहेलना करके वे मूर्ख अहीर उनके बारंबार मना करनेपर भी उस जनसमुदायपर टूट पड़े ॥ ५३ ॥ ततोऽर्जुनो धनुर्दिव्यं गाण्डीवमजरं महत् । आरोपयितुमारेभे यत्नादिव कथंचन ॥ ५४ ॥ तब अर्जुनने अपने दिव्य एवं कभी जीर्ण न होनेवाले विशाल धनुष गाण्डीवको चढ़ाना आरम्भ किया और बड़े प्रयत्नसे किसी तरह उसे चढ़ा दिया ॥