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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

आभीरा मन्त्रयामासुः समेत्याशुभदर्शनाः ॥ ४७ ॥ लोभसे उनके चित्तकी विवेकशक्ति नष्ट हो गयी। उन अशुभदर्शी पापाचारी आभीरोंने परस्पर मिलकर सलाह की ॥ ४७ ॥ अयमेकोऽर्जुनो धन्वी वृद्धबालं हतेश्वरम् । नयत्यस्मानतिक्रम्य योधाश्चेमे हतौजसः ॥ ४८ ॥ ‘भाइयो! देखो, यह अकेला धनुर्धर अर्जुन और ये हतोत्साह सैनिक हमलोगोंको लाँघकर वृद्धों और बालकोंके इस अनाथ समुदायको लिये जा रहे हैं (अतः इनपर आक्रमण करना चाहिये)’ ॥ ४८ ॥ ततो यष्टिप्रहरणा दस्यवस्ते सहस्रशः । अभ्यधावन्त वृष्णीनां तं जनं लोप्त्रहारिणः ॥ ४९ ॥ ऐसा निश्चय करके लूटका माल उड़ानेवाले वे लठ्ठधारी लुटेरे वृष्णिवंशियोंके उस समुदायपर हजारोंकी संख्यामें टूट पड़े ॥ ४९ ॥ महता सिंहनादेन त्रासयन्तः पृथग्जनम् । अभिपेतुर्र्वधार्थं ते कालपर्यायचोदिताः ॥ ५० ॥ समयके उलट-फेरसे प्रेरणा पाकर वे लुटेरे उन सबके वधके लिये उतारू हो अपने महान् सिंहनादसे साधारण लोगोंको डराते हुए उनकी ओर दौड़े ॥ ५० ॥ ततो निवृत्तः कौन्तेयः सहसा सपदानुगः । उवाच तान् महाबाहुरर्जुनः प्रहसन्निव ॥ ५१ ॥ आक्रमणकारियोंको पीछेकी ओरसे धावा करते देख कुन्तीकुमार महाबाहु अर्जुन सेवकोंसहित सहसा लौट पड़े और उनसे हँसते हुए-से-बोले— ॥ ५१ ॥ निवर्तध्वमधर्मज्ञा यदि जीवितुमिच्छथ । इदानीं शरनिर्भिन्नाः शोचध्वं निहता मया ॥ ५२ ॥ ‘धर्मको न जाननेवाले पापियो! यदि जीवित रहना चाहते हो तो लौट जाओ; नहीं तो मेरे द्वारा मारे जाकर या मेरे बाणोंसे विदीर्ण होकर इस समय तुम बड़े शोकमें पड़ जाओगे’ ॥ ५२ ॥ तथोक्तास्तेन वीरेण कदर्थीकृत्य तद्वचः । अभिपेतुरर्जुनं मूढा वार्यमाणाः पुनः पुनः ॥ ५३ ॥ वीरवर अर्जुनके ऐसा कहनेपर उनकी बातोंकी अवहेलना करके वे मूर्ख अहीर उनके बारंबार मना करनेपर भी उस जनसमुदायपर टूट पड़े ॥ ५३ ॥ ततोऽर्जुनो धनुर्दिव्यं गाण्डीवमजरं महत् । आरोपयितुमारेभे यत्नादिव कथंचन ॥ ५४ ॥ तब अर्जुनने अपने दिव्य एवं कभी जीर्ण न होनेवाले विशाल धनुष गाण्डीवको चढ़ाना आरम्भ किया और बड़े प्रयत्नसे किसी तरह उसे चढ़ा दिया ॥

चकार सज्जं कृच्छ्रेण सम्भ्रमे तुमुले सति । चिन्तयामास शस्त्राणि न च सस्मार तान्यपि ॥ ५५ ॥ भयंकर मार-काट छिड़नेपर बड़ी कठिनाईसे उन्होंने धनुषपर प्रत्यञ्चा तो चढ़ा दी; परंतु जब वे अपने अस्त्र-शस्त्रोंका चिन्तन करने लगे तब उन्हें उनकी याद बिलकुल नहीं आयी ॥ ५५ ॥

वैकृतं तन्महद् दृष्ट्वा भुजवीर्ये तथा युधि । दिव्यानां च महास्त्राणां विनाशाद् व्रीडितोऽभवत् ॥ ५६ ॥ युद्धके अवसरपर अपने बाहुबलमें यह महान् विकार आया देख और महान् दिव्यास्त्रोंका विस्मरण हुआ जान वे लज्जित हो गये ॥ ५६ ॥

वृष्णियोधाश्च ते सर्वे गजाश्वरथयोधिनः । न शेकुरावर्तयितुं ह्रियमाणं च तं जनम् ॥ ५७ ॥ हाथी, घोड़े और रथपर बैठकर युद्ध करनेवाले समस्त वृष्णिसैनिक भी उन डाकुओंके हाथमें पड़े हुए अपने मनुष्योंको लौटा न सके ॥ ५७ ॥

कलत्रस्य बहुत्वार्द्धि सम्पतत्सु ततस्ततः । प्रयत्नमकरोत् पार्थो जनस्य परिरक्षणे ॥ ५८ ॥ उस समुदायमें स्त्रियोंकी संख्या बहुत थी; इसलिये डाकू कई ओरसे उनपर धावा करने लगे तो भी अर्जुन उनकी रक्षाका यथासाध्य प्रयत्न करते रहे ॥ ५८ ॥

मिषतां सर्वयोधानां ततस्ताः प्रमदोत्तमाः । समन्ततोऽवकृष्यन्त कामाच्चान्याः प्रवव्रजुः ॥ ५९ ॥ सब योद्धाओंके देखते-देखते वे डाकू उन सुन्दरी स्त्रियोंको चारों ओरसे खींच-खींचकर ले जाने लगे। दूसरी स्त्रियाँ उनके स्पर्शके भयसे उनकी इच्छाके अनुसार चुपचाप उनके साथ चली गयीं ॥ ५९ ॥

ततो गाण्डीवनिर्मुक्तैः शरैः पार्थो धनंजयः । जघान दस्यून् सोद्वेगो वृष्णिभृत्यैः सहस्रशः ॥ ६० ॥ तब कुन्तीकुमार अर्जुन उद्विग्न होकर सहस्रों वृष्णिसैनिकोंको साथ ले गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा उन लुटेरोंके प्राण लेने लगे ॥ ६० ॥

क्षणेन तस्य ते राजन् क्षयं जग्मुरजिह्मगाः । अक्षया हि पुरा भूत्वा क्षीणाः क्षतजभोजनाः ॥ ६१ ॥ राजन्! अर्जुनके सीधे जानेवाले बाण क्षणभरमें क्षीण हो गये। जो रक्तभोगी बाण पहले अक्षय थे वे ही उस समय सर्वथा क्षयको प्राप्त हो गये ॥ ६१ ॥

स शरक्षयमासाद्य दुःखशोकसमाहतः । धनुष्कोट्या तदा दस्यूनवधीत् पाकशासनिः ॥ ६२ ॥

बाणोंके समाप्त हो जानेपर दुःख और शोकके आघात सहते हुए इन्द्रकुमार अर्जुन धनुषकी नोकसे ही उन डाकुओंका वध करने लगे ॥ ६२ ॥

प्रेक्षतस्त्वेव पार्थस्य वृष्ण्यन्धकवरस्त्रियः । जग्मुरादाय ते म्लेच्छाः समन्ताज्जनमेजय ॥ ६३ ॥

जनमेजय! अर्जुन देखते ही रह गये और वे म्लेच्छ डाकू सब ओरसे वृष्णि और अन्धकवंशकी सुन्दरी स्त्रियोंको लूट ले गये ॥ ६३ ॥

धनंजयस्तु दैवं तन्मनसाऽचिन्तयत् प्रभुः । दुःखशोकसमाविष्टो निःश्वासपरमोऽभवत् ॥ ६४ ॥

प्रभावशाली अर्जुनने मन-ही-मन इसे दैवका विधान समझा और दुःख-शोकमें डूबकर वे लंबी साँस लेने लगे ॥ ६४ ॥

अस्त्राणां च प्रणाशेन बाहुवीर्यस्य संक्षयात् । धनुषश्चाविधेयत्वाच्छराणां संक्षयेण च ॥ ६५ ॥ बभूव विमनाः पार्थो दैवमित्यनुचिन्तयन् ।

अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान लुप्त हो गया। भुजाओंका बल भी घट गया। धनुष भी काबूके बाहर हो गया और अक्षयबाणोंका भी क्षय हो गया। इन सब बातोंसे अर्जुनका मन उदास हो गया। वे इन सब घटनाओंको दैवका विधान मानने लगे ॥ ६५½ ॥

न्यवर्तत ततो राजन् नेदमस्तीति चाब्रवीत् ॥ ६६ ॥

राजन्! तदनन्तर अर्जुन युद्धसे निवृत्त हो गये और बोले—‘यह अस्त्रज्ञान आदि कुछ भी नित्य नहीं है’ ॥ ६६ ॥

ततः शेषं समादाय कलत्रस्य महामतिः । हृतभूयिष्ठरत्नस्य कुरुक्षेत्रमवातरत् ॥ ६७ ॥

फिर अपहरणसे बची हुई स्त्रियों और जिनका अधिक भाग लूट लिया गया था ऐसे बचे-खुचे रत्नोंको साथ लेकर परम बुद्धिमान् अर्जुन कुरुक्षेत्रमें उतरे ॥ ६७ ॥

एवं कलत्रमानीय वृष्णीनां हतशेषितम् । निवेशयत कौरव्यस्तत्र तत्र धनंजयः ॥ ६८ ॥

इस प्रकार अपहरणसे बची हुई वृष्णिवंशकी स्त्रियोंको ले आकर कुरुनन्दन अर्जुनने उनको जहाँ-तहाँ बसा दिया ॥ ६८ ॥

हार्दिक्यतनयं पार्थो नगरे मार्तिकावते । भोजराजकलत्रं च हृतशेषं नरोत्तमः ॥ ६९ ॥

कृतवर्माके पुत्रको और भोजराजके परिवारकी अपहरणसे बची हुई स्त्रियोंको नरश्रेष्ठ अर्जुनने मार्तिकावत नगरमें बसा दिया ॥ ६९ ॥

ततो वृद्धांश्च बालांश्च स्त्रियश्चादाय पाण्डवः । वीरैर्विहीनान् सर्वास्तान् शक्रप्रस्थे न्यवेशयत् ॥ ७० ॥

तत्पश्चात् वीरविहीन समस्त वृद्धों, बालकों तथा अन्य स्त्रियोंको साथ लेकर वे इन्द्रप्रस्थ आये और उन सबको वहाँका निवासी बना दिया ॥ ७० ॥

यौयुधानिं सरस्वत्यां पुत्रं सात्यकिनः प्रियम् ।
निवेशयत धर्मात्मा वृद्धबालपुरस्कृतम् ॥ ७१ ॥
धर्मात्मा अर्जुनने सात्यकिके प्रिय पुत्र यौयुधानिको सरस्वतीके तटवर्ती देशका अधिकारी एवं निवासी बना दिया और वृद्धों तथा बालकोंको उसके साथ कर दिया ॥

इन्द्रप्रस्थे ददौ राज्यं वज्राय परवीरहा ।
वज्रेणाक्रूरदारास्तु वार्यमाणाः प्रवव्रजुः ॥ ७२ ॥
इसके बाद शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनने व्रजको इन्द्रप्रस्थका राज्य दे दिया। अक्रूरजीकी स्त्रियाँ वज्रके बहुत रोकनेपर भी वनमें तपस्या करनेके लिये चली गयीं ॥

रुक्मिणी त्वथ गान्धारी शैव्या हैमवतीत्यपि ।
देवी जाम्बवती चैव विविशुर्जातवेदसम् ॥ ७३ ॥,
रुक्मिणी, गान्धारी, शैव्या, हैमवती तथा जाम्बवती देवीने पतिलोककी प्राप्तिके लिये अग्निमें प्रवेश किया ॥

सत्यभामा तथैवान्या देव्यः कृष्णस्य सम्मताः ।
वनं प्रविविशू राजंस्तापस्ये कृतनिश्चयाः ॥ ७४ ॥
राजन्! श्रीकृष्णप्रिया सत्यभामा तथा अन्य देवियाँ तपस्याका निश्चय करके वनमें चलीं गयीं ॥ ७४ ॥

द्वारकावासिनो ये तु पुरुषाः पार्थमभ्ययुः ।
यथार्हं संविभज्यैनान् वज्रे पर्यददज्जयः ॥ ७५ ॥
जो-जो द्वारकावासी मनुष्य पार्थके साथ आये थे, उन सबका यथायोग्य विभाग करके अर्जुनने उन्हें वज्रको सौंप दिया ॥ ७५ ॥

स तत् कृत्वा प्राप्तकालं बाष्पेणापिहितोऽर्जुनः ।
कृष्णद्वैपायनं व्यासं ददर्शासीनमाश्रमे ॥ ७६ ॥
इस प्रकार समयोचित व्यवस्था करके अर्जुन नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए महर्षि व्यासके आश्रमपर गये और वहाँ बैठे हुए महर्षिका उन्होंने दर्शन किया ॥ ७६ ॥

इति श्रीमहाभारते मौसलपर्वणि वृष्णिकलत्राद्यानयने सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत मौसलपर्वमें अर्जुनद्वारा वृष्णिवंशकी स्त्रियों और बालकोंका आनयनविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2480)

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टमोऽध्यायः

अर्जुन और व्यासजीकी बातचीत

वैशम्पायन उवाच

प्रविशन्नर्जुनो राजन्नाश्रमं सत्यवादिनः ।
ददर्शासीनमेकान्ते मुनिं सत्यवतीसुतम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! सत्यवादी व्यासजीके आश्रममें प्रवेश करके अर्जुनने देखा कि सत्यवतीनन्दन मुनिवर व्यास एकान्तमें बैठे हुए हैं ॥ १ ॥

स तमासाद्य धर्मज्ञमुपतस्थे महाव्रतम् ।
अर्जुनोऽस्मीति नामास्मै निवेद्याभ्यवादत् ततः ॥ २ ॥
महान् व्रतधारी तथा धर्मके ज्ञाता व्यासजीके पास पहुँचकर 'मैं अर्जुन हूँ' ऐसा कहते हुए धनंजयने उनके चरणोंमें प्रणाम किया। फिर वे उनके पास ही खड़े हो गये ॥ २ ॥

स्वागतं तेऽस्त्विति प्राह मुनिः सत्यवतीसुतः ।
आस्यतामिति होवाच प्रसन्नात्मा महामुनिः ॥ ३ ॥
उस समय प्रसन्नचित्त हुए महामुनि सत्यवती-नन्दन व्यासने अर्जुनसे कहा—'बेटा! तुम्हारा स्वागत है; आओ यहाँ बैठो' ॥ ३ ॥

तमप्रतीतमनसं निःश्वसन्तं पुनः पुनः ।
निर्विण्णमनसं दृष्ट्वा पार्थं व्यासोऽब्रवीदिदम् ॥ ४ ॥
अर्जुनका मन अशान्त था। वे बारंबार लंबी साँस खींच रहे थे। उनका चित्त खिन्न एवं विरक्त हो चुका था। उन्हें इस अवस्थामें देखकर व्यासजीने पूछा— ॥

नखकेशदशाकुम्भवारिणा किं समुक्षितः ।
आवीरजानुगमनं ब्राह्मणो वा हतस्त्वया ॥ ५ ॥
'पार्थ! क्या तुमने नख, बाल अथवा अधोवस्त्र (धोती)-की कोर पड़ जानेसे अशुद्ध हुए घड़ेके जलसे स्नान कर लिया है? अथवा तुमने रजस्वला स्त्रीसे समागम या किसी ब्राह्मणका वध तो नहीं किया है? ॥

युद्धे पराजितो वासि गतश्रीरिव लक्ष्यसे ।
न त्वां प्रभिन्नं जानामि किमिदं भरतर्षभ ॥ ६ ॥
श्रोतव्यं चेन्मया पार्थ क्षिप्रामाख्यातुमर्हसि ।
'कहीं तुम युद्धमें परास्त तो नहीं हो गये? क्योंकि श्रीहीन-से दिखायी देते हो। भरतश्रेष्ठ! तुम कभी पराजित हुए हो—यह मैं नहीं जानता; फिर तुम्हारी ऐसी दशा क्यों है? पार्थ! यदि मेरे सुननेयोग्य हो तो अपनी इस मलिनताका कारण मुझे शीघ्र बताओ' ॥ ६ १/२ ॥

अर्जुन उवाच

यः स मेघवपुः श्रीमान् बृहत्पङ्कजलोचनः ।। ७ ।।
स कृष्णः सह रामेण त्यक्त्वा देहं दिवं गतः ।
अर्जुनने कहा— भगवन्! जिनका सुन्दर विग्रह मेघके समान श्याम था और जिनके नेत्र विशाल कमलदलके समान शोभा पाते थे वे श्रीमान् भगवान् कृष्ण बलरामजीके साथ देहत्याग करके अपने परम धामको पधार गये ।। ७ १/२ ।।
(तद्वाक्यस्पर्शनालोकसुखं त्वमृतसंनिभम् ।
संस्मृत्य देवदेवस्य प्रमुह्याम्यमृतात्मनः ॥)
देवताओंके भी देवता, अमृतस्वरूप श्रीकृष्णके मधुर वचनोंको सुनने, उनके श्रीअंगोंका स्पर्श करने और उन्हें देखनेका जो अमृतके समान सुख था, उसे बार-बार याद करके मैं अपनी सुध-बुध खो बैठता हूँ ।।
मौसले वृष्णिवीराणां विनाशो ब्रह्मशापजः ।। ८ ।।
बभूव वीरान्तकरः प्रभासे लोमहर्षणः ।
ब्राह्मणोंके शापसे मौसलयुद्धमें वृष्णिवंशी वीरोंका विनाश हो गया। बड़े-बड़े वीरोंका अन्त कर देनेवाला वह रोमाञ्चकारी संग्राम प्रभासक्षेत्रमें घटित हुआ था ।।

एते शूरा महात्मानः सिंहदर्पा महाबलाः ॥ ९ ॥
भोजवृष्ण्यन्धका ब्रह्मन्नन्योन्यं तैर्र्हतं युधि ।
ब्रह्मन्! भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके ये महा-मनस्वी शूरवीर सिंहके समान दर्पशाली और महान् बलवान् थे; परन्तु वे गृहयुद्धमें एक-दूसरेके द्वारा मार डाले गये ॥ ९ १/२ ॥

गदापरिघशक्तीनां सहाः परिघबाहवः ॥ १० ॥
त एरकाभिर्निहताः पश्य कालस्य पर्ययम् ।
जो गदा, परिघ और शक्तियोंकी मार सह सकते थे वे परिघके समान सुदृढ़ बाहोंवाले यदुवंशी एरका नामक तृणविशेषके द्वारा मारे गये—यह समयका उलट-फेर तो देखिये ॥ १० १/२ ॥

हतं पञ्चशतं तेषां सहस्रं बाहुशालिनाम् ॥ ११ ॥
निधनं समनुप्राप्तं समासाद्येतरेतरम् ।
अपने बाहुबलसे शोभा पानेवाले पाँच लाख वीर आपसमें ही लड़-भिड़कर मर मिटे ॥ ११ १/२ ॥

पुनः पुनर्न मृष्यामि विनाशममितौजसाम् ॥ १२ ॥
चिन्तयानो यदूनां च कृष्णस्य च यशस्विनः ।
शोषणं सागरस्येव पर्वतस्येव चालनम् ॥ १३ ॥
नभसः पतनं चैव शैत्यमग्नेस्तथैव च ।
अश्रद्धेयमहं मन्ये विनाशं शार्ङ्गधन्वनः ॥ १४ ॥
उन अमित तेजस्वी वीरोंके विनाशका दुःख मुझसे किसी तरह सहा नहीं जाता। मैं बार-बार उस दुःखसे व्यथित हो जाता हूँ। यशस्वी श्रीकृष्ण और यदुवंशियोंके परलोक-गमनकी बात सोचकर तो मुझे ऐसा जान पड़ता है, मानो समुद्र सूख गया, पर्वत हिलने लगे, आकाश फट पड़ा और अग्निके स्वभावमें शीतलता आ गयी। शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले श्रीकृष्ण भी मृत्युके अधीन हुए होंगे—यह बात विश्वासके योग्य नहीं है। मैं इसे नहीं मानता ॥ १२—१४ ॥

न चेह स्थातुमिच्छामि लोके कृष्णविनाकृतः ।
इतः कष्टतरं चान्यच्छृणु तद् वै तपोधन ॥ १५ ॥
फिर भी श्रीकृष्ण मुझे छोड़कर चले गये। मैं इस संसारमें उनके बिना नहीं रहना चाहता। तपोधन! इसके सिवा जो दूसरी घटना घटित हुई है वह इससे भी अधिक कष्टदायक है। आप इसे सुनिये ॥ १५ ॥

मनो मे दीर्यते येन चिन्तयानस्य वै मुहुः ।
पश्यतो वृष्णिदारांश्च मम ब्रह्मन् सहस्रशः ॥ १६ ॥
आभीरैरनुसृत्याजौ हृताः पञ्चनदालयैः ।

जब मैं उस घटनाका चिन्तन करता हूँ तब बारंबार मेरा हृदय विदीर्ण होने लगता है। ब्रह्मन्! पंजाबके अहीरोंने मुझसे युद्ध ठानकर मेरे देखते-देखते वृष्णिवंशकी हजारों स्त्रियोंका अपहरण कर लिया ॥ १६½ ॥

धनुरादाय तत्राहं नाशकं तस्य पूरणे ॥ १७ ॥
यथा पुरा च मे वीर्यं भुजयोर्न तथाभवत् ।
मैंने धनुष लेकर उनका सामना करना चाहा परंतु मैं उसे चढ़ा न सका। मेरी भुजाओंमें पहले-जैसा बल था वैसा अब नहीं रहा ॥ १७½ ॥

अस्त्राणि मे प्रणष्टानि विविधानि महामुने ॥ १८ ॥
शराश्च क्षयमापन्नाः क्षणेनैव समन्ततः ।
महामुने! मेरा नाना प्रकारके अस्त्रोंका ज्ञान विलुप्त हो गया। मेरे सभी बाण सब ओर जाकर क्षणभरमें नष्ट हो गये ॥ १८½ ॥

पुरुषश्चाप्रमेयात्मा शङ्खचक्रगदाधरः ॥ १९ ॥
चतुर्भुजः पीतवासाः श्यामः पद्मदलेक्षणः ।
यश्च याति पुरस्तान्मे रथस्य सुमहाद्युतिः ॥ २० ॥
प्रदहन् रिपुसैन्यानि न पश्याम्यहमच्युतम् ।
जिनका स्वरूप अप्रमेय है, जो शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले, चतुर्भुज, पीताम्बरधारी, श्यामसुन्दर तथा कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाले हैं, जो महातेजस्वी प्रभु शत्रुओंकी सेनाओंको भस्म करते हुए मेरे रथके आगे-आगे चलते थे, उन्हीं भगवान् अच्युतको अब मैं नहीं देख पाता हूँ ॥ १९-२०½ ॥

येन पूर्वं प्रदग्धानि शत्रुसैन्यानि तेजसा ॥ २१ ॥
शरैर्गाण्डीवनिर्मुक्तैरहं पश्चाच्च नाशयम् ।
तमपश्यन् विषीदामि घूर्णामीव च सत्तम ॥ २२ ॥
साधुशिरोमणे! जो पहले स्वयं ही अपने तेजसे शत्रुसेनाओंको दग्ध कर देते थे, उसके बाद मैं गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा उन शत्रुओंका नाश करता था, उन्हीं भगवान्‌को आज न देखनेके कारण मैं विषादमें डूबा हुआ हूँ। मुझे चक्कर-सा आ रहा है ॥ २१-२२ ॥

परिनिर्विण्णचेताश्च शान्तिं नोपलभेऽपि च ।
(देवकीनन्दनं देवं वासुदेवमजं प्रभुम् ।)
विना जनार्दनं वीरं नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ २३ ॥
मेरे चित्तमें निर्वेद छा गया है। मुझे शान्ति नहीं मिलती है। मैं देवस्वरूप, अजन्मा, भगवान् देवकीनन्दन वासुदेव वीर जनार्दनके बिना अब जीवित रहना नहीं चाहता ॥ २३ ॥

श्रुत्वैव हि गतं विष्णुं ममापि मुमुहुर्दिशः ।
प्रणष्टज्ञातिवीर्यस्य शून्यस्य परिधावतः ॥ २४ ॥

उपदेष्टुं मम श्रेयो भवानर्हति सत्तम ।
सर्वव्यापी भगवान् श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये, यह बात सुनते ही मुझे सम्पूर्ण दिशाओंका ज्ञान भूल जाता है। मेरे भी जाति-भाइयोंका नाश तो पहले ही हो गया था, अब मेरा पराक्रम भी नष्ट हो गया; अतः शून्यहृदय होकर इधर-उधर दौड़ लगा रहा हूँ। संतोंमें श्रेष्ठ महर्षे! आप कृपा करके मुझे यह उपदेश दें कि मेरा कल्याण कैसे होगा? ।। २४१/२ ।।

व्यास उवाच

(देवांशा देवदेवेन सम्मतास्ते गताः सह ।
धर्मव्यवस्थारक्षार्थं देवेन समुपेक्षिताः ॥)
**व्यासजी बोले—**कुन्तीकुमार! वे समस्त यदुवंशी देवताओंके अंश थे। वे देवाधिदेव श्रीकृष्णके साथ ही यहाँ आये थे और साथ ही चले गये। उनके रहनेसे धर्मकी मर्यादाके भंग होनेका डर था; अतः भगवान् श्रीकृष्णने धर्म-व्यवस्थाकी रक्षाके लिये उन मरते हुए यादवोंकी उपेक्षा कर दी ॥
ब्रह्मशापविनिर्दग्धा वृष्ण्यन्धकमहारथाः ॥ २५ ॥
विनष्टाः कुरुशार्दूल न तान् शोचितुमर्हसि ।
भवितव्यं तथा तच्च दिष्टमेतन्महात्मनाम् ॥ २६ ॥
कुरुश्रेष्ठ! वृष्णि और अन्धकवंशके महारथी ब्राह्मणोंके शापसे दग्ध होकर नष्ट हुए हैं; अतः तुम उनके लिये शोक न करो। उन महामनस्वी वीरोंकी भवितव्यता ही ऐसी थी। उनका प्रारब्ध ही वैसा बन गया था ॥ २५-२६ ॥
उपेक्षितं च कृष्णेन शक्तेनापि व्यपोहितुम् ।
त्रैलोक्यमपि गोविन्दः कृत्स्नं स्थावरजङ्गमम् ॥ २७ ॥
प्रसहेदन्यथाकर्तुं कुतः शापं महात्मनाम् ।
यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण उनके संकटको टाल सकते थे तथापि उन्होंने इसकी उपेक्षा कर दी। श्रीकृष्ण तो सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंकी गतिको पलट सकते हैं, फिर उन महामनस्वी वीरोंको प्राप्त हुए शापको पलट देना उनके लिये कौन बड़ी बात थी ॥
(स्त्रियश्च ताः पुरा शप्ताः प्रहासकुपितेन वै ।
अष्टावक्रेण मुनिना तदर्थं त्वद्बलक्षयः ॥)
(तुम्हारे देखते-देखते स्त्रियोंका जो अपहरण हुआ है, उसमें भी देवताओंका एक रहस्य है।) वे स्त्रियाँ पूर्वजन्ममें अप्सराएँ थीं। उन्होंने अष्टावक्र मुनिके रूपका उपहास किया था। मुनिने शाप दिया था (कि ‘तुमलोग मानवी हो जाओ और दस्युओंके हाथमें पड़नेपर तुम्हारा इस शापसे उद्धार होगा।’) इसीलिये तुम्हारे बलका क्षय हुआ (जिससे वे डाकुओंके

हाथमें पड़कर उस शापसे छुटकारा पा जायें), (अब वे अपना पूर्वरूप और स्थान पा चुकी हैं, अतः उनके लिये भी शोक करनेकी आवश्यकता नहीं है) ॥

रथस्य पुरतो याति यः स चक्रगदाधरः ॥ २८ ॥
तव स्नेहात् पुराणर्षिर्वासुदेवश्चतुर्भुजः ।
जो स्नेहवश तुम्हारे रथके आगे चलते थे (सारथिका काम करते थे), वे वासुदेव कोई साधारण पुरुष नहीं, साक्षात् चक्र-गदाधारी पुरातन ऋषि चतुर्भुज नारायण थे ॥ २८ १/२ ॥

कृत्वा भारावतरणं पृथिव्याः पृथुलोचनः ॥ २९ ॥
मोक्षयित्वा तनुं प्राप्तः कृष्णः स्वस्थानमुत्तमम् ।
वे विशाल नेत्रोंवाले श्रीकृष्ण इस पृथ्वीका भार उतारकर शरीर त्याग अपने उत्तम परम धामको जा पहुँचे हैं ॥ २९ १/२ ॥

त्वयापीह महत् कर्म देवानां पुरुषर्षभ ॥ ३० ॥
कृतं भीमसहायने यमाभ्यां च महाभुज ।
पुरुषप्रवर! महाबाहो! तुमने भी भीमसेन और नकुल-सहदेवकी सहायतासे देवताओंका महान् कार्य सिद्ध किया है ॥ ३० १/२ ॥

कृतकृत्यांश्च वो मन्ये संसिद्धान् कुरुपुङ्गव ॥ ३१ ॥
गमनं प्राप्तकालं व इदं श्रेयस्करं विभो ।
कुरुश्रेष्ठ! मैं समझता हूँ कि अब तुमलोगोंने अपना कर्तव्य पूर्ण कर लिया है। तुम्हें सब प्रकारसे सफलता प्राप्त हो चुकी है। प्रभो! अब तुम्हारे परलोक-गमनका समय आया है और यही तुमलोगोंके लिये श्रेयस्कर है ॥ ३१ १/२ ॥

एवं बुद्धिश्च तेजश्च प्रतिपत्तिश्च भारत ॥ ३२ ॥
भवन्ति भवकालेषु विपद्यन्ते विपर्यये ।
भरतनन्दन! जब उद्भवका समय आता है तब इसी प्रकार मनुष्यकी बुद्धि, तेज और ज्ञानका विकास होता है और जब विपरीत समय उपस्थित होता है तब इन सबका नाश हो जाता है ॥ ३२ १/२ ॥

कालमूलमिदं सर्वं जगद्बीजं धनंजय ॥ ३३ ॥
काल एव समादत्ते पुनरेव यदृच्छया ।
धनंजय! काल ही इन सबकी जड़ है। संसारकी उत्पत्तिका बीज भी काल ही है और काल ही फिर अकस्मात् सबका संहार कर देता है ॥ ३३ १/२ ॥

स एव बलवान् भूत्वा पुनर्भवति दुर्बलः ॥ ३४ ॥
स एवेशश्च भूत्वेह परैराज्ञाप्यते पुनः ।
वही बलवान् होकर फिर दुर्बल हो जाता है और वही एक समय दूसरोंका शासक होकर कालान्तरमें स्वयं दूसरोंका आज्ञापालक हो जाता है ॥ ३४ १/२ ॥

॥ मौसलपर्व सम्पूर्ण ॥

कृतकृत्यानि चास्त्राणि गतान्यद्य यथागतम् ॥ ३५ ॥
पुनरेष्यन्ति ते हस्ते यदा कालो भविष्यति ।
तुम्हारे अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोजन भी पूरा हो गया है; इसलिये वे जैसे मिले थे वैसे ही चले गये। जब उपयुक्त समय होगा तब वे फिर तुम्हारे हाथमें आयेंगे ॥

कालो गन्तुं गतिं मुख्यां भवतामपि भारत ॥ ३६ ॥
एतत् श्रेयो हि वो मन्ये परमं भरतर्षभ ।
भारत! अब तुमलोगोंके उत्तम गति प्राप्त करनेका समय उपस्थित है। भरतश्रेष्ठ! मुझे इसीमें तुमलोगोंका परम कल्याण जान पड़ता है ॥ ३६ १/२ ॥

वैशम्पायन उवाच

एतद् वचनमाज्ञाय व्यासस्यामिततेजसः ॥ ३७ ॥
अनुज्ञातो ययौ पार्थो नगरं नागसाह्वयम् ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अमिततेजस्वी व्यासजीके इस वचनका तत्त्व समझकर अर्जुन उनकी आज्ञा ले हस्तिनापुरको चले गये ॥ ३७ १/२ ॥

प्रविश्य च पुरीं वीरः समासाद्य युधिष्ठिरम् ।
आचष्ट तद् यथावृत्तं वृष्ण्यन्धककुलं प्रति ॥ ३८ ॥
नगरमें प्रवेश करके वीर अर्जुन युधिष्ठिरसे मिले और वृष्णि तथा अन्धकवंशका यथावत् समाचार उन्होंने कह सुनाया ॥ ३८ ॥

इति श्रीमहाभारते मौसलपर्वणि व्यासार्जुनसंवादे अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत मौसलपर्वमें व्यास और अर्जुनका संवादविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ४१ १/२ श्लोक हैं)


॥ मौसलपर्व सम्पूर्ण ॥


अनुष्टुप्(अन्य बड़े छन्द)बड़े छन्दोंको ३२ अक्षरोंके<br>अनुष्टुप् मानकर गिननेपरकुलयोग
उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये२६०(३०)४१ ।३०१ ।
दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये३ ॥३ ॥
मौसलपर्वकी कुल श्लोकसंख्या —३०४।।

अध्याय (पृष्ठ 2487)

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अग्निकी प्रेरणासे अर्जुन अपने गाण्डीव धनुष और अक्षय तरकसको जलमें डाल रहे हैं

महाप्रस्थानिकपर्व

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।। ॐ श्रीपरमात्मने नमः ।।

श्रीमहाभारतम्

महाप्रस्थानिकपर्व

प्रथमोऽध्यायः

वृष्णिवंशियोंका श्राद्ध करके प्रजाजनोंकी अनुमति ले द्रौपदीसहित पाण्डवोंका महाप्रस्थान

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये ।।

जनमेजय उवाच

एवं वृष्ण्यन्धककुले श्रुत्वा मौसलमाहवम् ।
पाण्डवाः किमकुर्वन्त तथा कृष्णे दिवं गते ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन्! इस प्रकार वृष्णि और अन्धकवंशके वीरोंमें मूसलयुद्ध होनेका समाचार सुनकर भगवान् श्रीकृष्णके परमधाम पधारनेके पश्चात् पाण्डवोंने क्या किया? ।। १ ।।

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वैवं कौरवो राजा वृष्णीनां कदनं महत् ।
प्रस्थाने मतिमाधाय वाक्यमर्जुनमब्रवीत् ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! कुरुराज युधिष्ठिरने जब इस प्रकार वृष्णिवंशियोंके महान् संहारका समाचार सुना तब महाप्रस्थानका निश्चय करके अर्जुनसे कहा— ।। २ ।।
कालः पचति भूतानि सर्वाण्येव महामते ।
कालपाशमहं मन्ये त्वमपि द्रष्टुमर्हसि ॥ ३ ॥

‘महामते! काल ही सम्पूर्ण भूतोंको पका रहा है—विनाशकी ओर ले जा रहा है। अब मैं कालके बन्धनको स्वीकार करता हूँ। तुम भी इसकी ओर दृष्टिपात करो’। ।। इत्युक्तः स तु कौन्तेयः कालः काल इति ब्रुवन् । अन्वपद्यत तद् वाक्यं भ्रातुर्ज्येष्ठस्य धीमतः ॥ ४ ॥ भाईके ऐसा कहनेपर कुन्तीकुमार अर्जुनने ‘काल तो काल ही है, इसे टाला नहीं जा सकता’ ऐसा कहकर अपने बुद्धिमान् बड़े भाईके कथनका अनुमोदन किया ॥ ४ ॥ अर्जुनस्य मतं ज्ञात्वा भीमसेनो यमौ तथा । अन्वपद्यन्त तद् वाक्यं यदुक्तं सव्यसाचिना ॥ ५ ॥ अर्जुनका विचार जानकर भीमसेन और नकुल-सहदेवने भी उनकी कही हुई बातका अनुमोदन किया ॥ ततो युयुत्सुमानाय्य प्रव्रजन् धर्मकाम्यया । राज्यं परिददौ सर्वं वैश्यापुत्रे युधिष्ठिरः ॥ ६ ॥ तत्पश्चात् धर्मकी इच्छासे राज्य छोड़कर जानेवाले युधिष्ठिरने वैश्यापुत्र युयुत्सुको बुलाकर उन्हींको सम्पूर्ण राज्यकी देख-भालका भार सौंप दिया ॥ ६ ॥ अभिषिच्य स्वराज्ये च राजानं च परीक्षितम् । दुःखार्तश्चाब्रवीद् राजा सुभद्रां पाण्डवाग्रजः ॥ ७ ॥ फिर अपने राज्यपर राजा परीक्षित्‌का अभिषेक करके पाण्डवोंके बड़े भाई महाराज युधिष्ठिरने दुःखसे आर्त होकर सुभद्रासे कहा— ॥ ७ ॥ एष पुत्रस्य पुत्रस्ते कुरुराजो भविष्यति । यदूंनां परिशेषश्च वज्रो राजा कृतश्च ह ॥ ८ ॥ ‘बेटी! यह तुम्हारे पुत्रका पुत्र परीक्षित् कुरुदेश तथा कौरवोंका राजा होगा और यादवोंमें जो लोग बच गये हैं उनका राजा श्रीकृष्ण-पौत्र वज्रको बनाया गया है ॥ ८ ॥ परिक्षिद्धास्तिनपुरे शक्रप्रस्थे च यादवः । वज्रो राजा त्वया रक्ष्यो मा चाधर्मे मनः कृथाः ॥ ९ ॥ ‘परीक्षित हस्तिनापुरमें राज्य करेंगे और यदुवंशी वज्र इन्द्रप्रस्थमें। तुम्हें राजा वज्रकी भी रक्षा करनी चाहिये और अपने मनको कभी अधर्मकी ओर नहीं जाने देना चाहिये’ ॥ ९ ॥ इत्युक्त्वा धर्मराजः स वासुदेवस्य धीमतः । मातुलस्य च वृद्धस्य रामादीनां तथैव च ॥ १० ॥ भ्रातृभिः सह धर्मात्मा कृतोदकममन्द्रितः । श्राद्धान्युद्दिश्य सर्वेषां चकार विधिवत् तदा ॥ ११ ॥ ऐसा कहकर धर्मात्मा धर्मराज युधिष्ठिरने भाइयों-सहित आलस्य छोड़कर बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्ण, बूढ़े मामा वसुदेव तथा बलराम आदिके लिये जलाञ्जलि दी और उन

सबके उद्देश्यसे विधिपूर्वक श्राद्ध किया ।। द्वैपायनं नारदं च मार्कण्डेयं तपोधनम् । भारद्वाजं याज्ञवल्क्यं हरिमुद्दिश्य यत्नवान् ॥ १२ ॥ अभोजयत् स्वादु भोज्यं कीर्तयित्वा च शार्ङ्गिणम् । ददौ रत्नानि वासांसि ग्रामानश्वान् रथांस्तथा ॥ १३ ॥ स्त्रियश्च द्विजमुख्येभ्यस्तदा शतसहस्रशः । प्रयत्नशील युधिष्ठिरने भगवान् श्रीकृष्णके उद्देश्यसे द्वैपायन व्यास, देवर्षि नारद, तपोधन मार्कण्डेय, भारद्वाज और याज्ञवल्क्य मुनिको सुस्वादु भोजन कराया। भगवान्‌का नाम कीर्तन करके उन्होंने उत्तम ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न, वस्त्र, ग्राम, घोड़े और रथ प्रदान किये। बहुत-से ब्राह्मणशिरोमणियोंको लाखों कुमारी कन्याएँ दीं ।।

कृपमभ्यर्च्य च गुरुमथ पौरपुरस्कृतम् ॥ १४ ॥ शिष्यं परिक्षितं तस्मै ददौ भरतसत्तमः । तत्पश्चात् गुरुवर कृपाचार्यकी पूजा करके पुरवासियों-सहित परीक्षित्‌को शिष्यभावसे उनकी सेवामें सौंप दिया ।।

ततस्तु प्रकृतीः सर्वाः समानाय्य युधिष्ठिरः ॥ १५ ॥ सर्वमाचष्ट राजर्षिश्चिकीर्षितमथात्मनः । इसके बाद समस्त प्रकृतियों (प्रजा-मन्त्री आदि)-को बुलाकर राजर्षि युधिष्ठिरने, वे जो कुछ करना चाहते थे अपना वह सारा विचार उनसे कह सुनाया ।।

ते श्रुत्वैव वचस्तस्य पौरजानपदा जनाः ॥ १६ ॥ भृशमुद्विग्नमनसो नाभ्यनन्दन्त तद्वचः । नैवं कर्तव्यमिति ते तदोचुस्तं जनाधिपम् ॥ १७ ॥ उनकी वह बात सुनते ही नगर और जनपदके लोग मन-ही-मन अत्यन्त उद्विग्न हो उठे। उन्होंने उस प्रस्तावका स्वागत नहीं किया। वे सब राजासे एक साथ बोले—‘आपको ऐसा नहीं करना चाहिये (आप हमें छोड़कर कहीं न जायँ)' ।। १६-१७ ।।

न च राजा तथाकार्षीत् कालपर्यायधर्मवित् । परंतु धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर कालके उलट-फेरके अनुसार जो धर्म या कर्तव्य प्राप्त था उसे जानते थे; अतः उन्होंने प्रजाके कथनानुसार कार्य नहीं किया ।।

ततोऽनुमान्य धर्मात्मा पौरजानपदं जनम् ॥ १८ ॥ गमनाय मतिं चक्रे भ्रातरश्चास्य ते तदा । उन धर्मात्मा नरेशने नगर और जनपदके लोगोंको समझा-बुझाकर उनकी अनुमति प्राप्त कर ली। फिर उन्होंने और उनके भाइयोंनै सब कुछ त्यागकर महा-प्रस्थान करनेका ही निश्चय किया ।। १८ १/२ ।।

ततः स राजा कौरव्यो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ १९ ॥

उत्सृज्याभरणान्यङ्गाज्जगृहे वल्कलान्युत ।
भीमार्जुनयमाश्चैव द्रौपदी च यशस्विनी ॥ २० ॥
तथैव जगृहुः सर्वे वल्कलानि नराधिप ।
इसके बाद कुरुकुलरत्न धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने अपने अंगोंसे आभूषण उतारकर वल्कलवस्त्र धारण कर लिया। नरेश्वर! फिर भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा यशस्विनी द्रौपदी देवी—न सबने भी उसी प्रकार वल्कल धारण किये ॥ १९-२० १/२ ॥

विधिवत् कारयित्वेष्टिं नैष्ठिकीं भरतर्षभ ॥ २१ ॥
समुत्सृज्याप्सु सर्वेऽग्नीन् प्रतस्थुर्नरपुङ्गवाः ।
भरतश्रेष्ठ! इसके बाद ब्राह्मणोंसे विधिपूर्वक उत्सर्गकालिक इष्टि करवाकर उन सभी नरश्रेष्ठ पाण्डवोंने अग्नियोंका जलमें विसर्जन कर दिया और स्वयं वे महायात्राके लिये प्रस्थित हुए ॥ २१ १/२ ॥

ततः प्ररुरुदुः सर्वाः स्त्रियो दृष्ट्वा नरोत्तमान् ॥ २२ ॥
प्रस्थितान् द्रौपदीषष्ठान् पुरा द्यूतजितान् यथा ।
हर्षोऽभवच्च सर्वेषां भ्रातॄणां गमनं प्रति ॥ २३ ॥
पहले जूएमें परास्त होकर पाण्डवलोग जिस प्रकार वनमें गये थे उसी प्रकार उस दिन द्रौपदीसहित उन नरोत्तम पाण्डवोंको इस प्रकार जाते देख नगरकी सभी स्त्रियाँ रोने लगीं। परन्तु उन सभी भाइयोंको इस यात्रासे महान् हर्ष हुआ ॥ २२-२३ ॥

युधिष्ठिरमतं ज्ञात्वा वृष्णिक्षयमवेक्ष्य च ।
भ्रातरः पञ्च कृष्णा च षष्ठी श्वा चैव सप्तमः ॥ २४ ॥
युधिष्ठिरका अभिप्राय जान और वृष्णिवंशियोंका संहार देखकर पाँचों भाई पाण्डव, द्रौपदी और एक कुत्ता—ये सब साथ-साथ चले ॥ २४ ॥

आत्मना सप्तमो राजा निर्ययौ गजसाह्वयात् ।
पौरैरनुगतो दूरं सर्वैरन्तःपुरैस्तथा ॥ २५ ॥
न चैनमशकत् कश्चिन्निवर्तस्वेति भाषितुम् ।
उन छहोंको साथ लेकर सातवें राजा युधिष्ठिर जब हस्तिनापुरसे बाहर निकले तब नगरनिवासी प्रजा और अन्तःपुरकी स्त्रियाँ उन्हें बहुत दूरतक पहुँचाने गयीं; किंतु कोई भी मनुष्य राजा युधिष्ठिरसे यह नहीं कह सका कि आप लौट चलिये ॥ २५ १/२ ॥

न्यवर्तन्त ततः सर्वे नरा नगरवासिनः ॥ २६ ॥
कृपप्रभृतयश्चैव युयुत्सुं पर्यवारयन् ।
धीरे-धीरे समस्त पुरवासी और कृपाचार्य आदि युयुत्सुको घेरकर उनके साथ ही लौट आये ॥ २६ १/२ ॥

विवेश गङ्गां कौरव्य उलूपी भुजगात्मजा ॥ २७ ॥
चित्राङ्गदा ययौ चापि मणिपूरपुरं प्रति ।

शिष्टाः परिक्षितं त्वन्या मातरः पर्यवारयन् ।। २८ ।। जनमेजय! नागराजकी कन्या उलूपी उसी समय गंगाजीमें समा गयी। चित्रांगदा मणिपुर नगरमें चली गयी। तथा शेष माताएँ परीक्षित्‌को घेरे हुए पीछे लौट आयीं ।। २७-२८ ।।

पाण्डवाश्च महात्मानो द्रौपदी च यशस्विनी । कृतोपवासाः कौरव्य प्रययुः प्राङ्मुखास्ततः ।। २९ ।। कुरुनन्दन! तदनन्तर महात्मा पाण्डव और यशस्विनी द्रौपदीदेवी सब-के-सब उपवासका व्रत लेकर पूर्वदिशाकी ओर मुँह करके चल दिये ।। २९ ।।

योगयुक्ता महात्मानस्त्यागधर्ममुपेयुषः । अभिजग्मुर्बहून् देशान् सरितः सागरांस्तथा ।। ३० ।। वे सब-के-सब योगयुक्त महात्मा तथा त्याग-धर्मका पालन करनेवाले थे। उन्होंने अनेक देशों, नदियों और समुद्रोंकी यात्रा की ।। ३० ।।

युधिष्ठिरो ययावग्रे भीमस्तु तदनन्तरम् । अर्जुनस्तस्य चान्वेव यमौ चापि यथाक्रमम् ।। ३१ ।। आगे-आगे युधिष्ठिर चलते थे। उनके पीछे भीमसेन थे। भीमसेनके भी पीछे अर्जुन थे और उनके भी पीछे क्रमशः नकुल और सहदेव चल रहे थे ।। ३१ ।।

पृष्ठतस्तु वरारोहा श्यामा पद्मदलेक्षणा । द्रौपदी योषितां श्रेष्ठा ययौ भरतसत्तम ।। ३२ ।। भरतश्रेष्ठ! इन सबके पीछे सुन्दर शरीरवाली, श्यामवर्णा, कमलदललोचना, युवतियोंमें श्रेष्ठ द्रौपदी चल रही थी ।। ३२ ।।

श्वा चैवानुययावेकः प्रस्थितान् पाण्डवान् वनम् । क्रमेण ते ययुर्वीरा लौहित्यं सलिलार्णवम् ।। ३३ ।। वनको प्रस्थित हुए पाण्डवोंके पीछे एक कुत्ता भी चला जा रहा था। क्रमशः चलते हुए वे वीर पाण्डव लालसागरके तटपर जा पहुँचे ।। ३३ ।।

गाण्डीवं तु धनुर्दिव्यं न मुमोच धनंजयः । रत्नलोभान् महाराज ते चाक्षय्ये महेषुधी ।। ३४ ।। महाराज! अर्जुनने दिव्यरत्नके लोभसे अभीतक अपने दिव्य गाण्डीव धनुष तथा दोनों अक्षय तूणीरोंका परित्याग नहीं किया था ।। ३४ ।।

अग्निं ते ददृशुस्तत्र स्थितं शैलमिवाग्रतः । मार्गमावृत्य तिष्ठन्तं साक्षात्पुरुषविग्रहम् ।। ३५ ।। वहाँ पहुँचकर उन्होंने पर्वतकी भाँति मार्ग रोककर सामने खड़े हुए पुरुषरूपधारी साक्षात् अग्निदेवको देखा ।।

ततो देवः स सप्तार्चिः पाण्डवानिदमब्रवीत् । भो भोः पाण्डुसुता वीराः पावकं मां निबोधत ॥ ३६ ॥ तब सात प्रकारकी ज्वलारूप जिह्वाओंसे सुशोभित होनेवाले उन अग्निदेवने पाण्डवोंसे इस प्रकार कहा—'वीर पाण्डुकुमारो! मुझे अग्नि समझो ॥ ३६ ॥

युधिष्ठिर महाबाहो भीमसेन परंतप । अर्जुनाश्विसुतौ वीरौ निबोधत वचो मम ॥ ३७ ॥ 'महाबाहु युधिष्ठिर! शत्रुसंतापी भीमसेन! अर्जुन! और वीर अश्विनीकुमारो! तुम सब लोग मेरी इस बातपर ध्यान दो ॥ ३७ ॥

अहमग्निः कुरुश्रेष्ठा मया दग्धं च खाण्डवम् । अर्जुनस्य प्रभावेण तथा नारायणस्य च ॥ ३८ ॥ 'कुरुश्रेष्ठ वीरो! मैं अग्नि हूँ। मैंने ही अर्जुन तथा नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णके प्रभावसे खाण्डव-वनको जलाया था ॥ ३८ ॥

अयं वः फाल्गुनो भ्राता गाण्डीवं परमायुधम् । परित्यज्य वने यातु नानेनार्थोऽस्ति कश्चन ॥ ३९ ॥ 'तुम्हारे भाई अर्जुनको चाहिये कि ये इस उत्तम आयुध गाण्डीव धनुषको त्यागकर वनमें जायँ। अब इन्हें इसकी कोई आवश्यकता नहीं है ॥ ३९ ॥

चक्ररत्नं तु यत् कृष्णे स्थितमासीन्महात्मनि । गतं तच्च पुनर्हस्ते कालेनैष्यति तस्य ह ॥ ४० ॥ 'पहले जो चक्ररत्न महात्मा श्रीकृष्णके हाथमें था वह चला गया। वह पुनः समय आनेपर उनके हाथमें जायगा ॥ ४० ॥

वरुणादाहृतं पूर्वं मयैतत् पार्थकारणात् । गाण्डीवं धनुषां श्रेष्ठं वरुणायैव दीयताम् ॥ ४१ ॥ 'यह गाण्डीव धनुष सब प्रकारके धनुषोंमें श्रेष्ठ है। इसे पहले मैं अर्जुनके लिये ही वरुणसे माँगकर ले आया था। अब पुनः इसे वरुणको वापस कर देना चाहिये' ॥ ४१ ॥

ततस्ते भ्रातरः सर्वे धनंजयमचोदयन् । स जले प्राक्षिपच्चैतत्तथाक्षय्ये महेषुधी ॥ ४२ ॥ यह सुनकर उन सब भाइयोंने अर्जुनको वह धनुष त्याग देनेके लिये कहा। तब अर्जुनने वह धनुष और दोनों अक्षय तरकस पानीमें फेंक दिये ॥ ४२ ॥

ततोऽग्निर्भरतश्रेष्ठ तत्रैवान्तरधीयत । ययुश्च पाण्डवा वीरास्ततस्ते दक्षिणामुखाः ॥ ४३ ॥ भरतश्रेष्ठ! इसके बाद अग्निदेव वहीं अन्तर्धान हो गये और पाण्डववीर वहाँसे दक्षिणाभिमुख होकर चल दिये ॥

ततस्ते तूत्तरेणैव तीरेण लवणाम्भसः । जग्मुर्भरतशार्दूल दिशं दक्षिणपश्चिमाम् ॥ ४४ ॥ भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर वे लवणसमुद्रके उत्तर तटपर होते हुए दक्षिण-पश्चिमदिशाकी ओर अग्रसर होने लगे ॥

ततः पुनः समावृत्ताः पश्चिमां दिशमेव ते । ददृशुर्द्वारकां चापि सागरेण परिप्लुताम् ॥ ४५ ॥ उदीचीं पुनरावृत्य ययुर्भरतसत्तमाः । प्रादक्षिण्यं चिकीर्षन्तः पृथिव्या योगधर्मिणः ॥ ४६ ॥ इसके बाद वे केवल पश्चिम दिशाकी ओर मुड़ गये। आगे जाकर उन्होंने समुद्रमें डुबी हुई द्वारकापुरीको देखा। फिर योगधर्ममें स्थित हुए भरतभूषण पाण्डवोंने वहाँसे लौटकर पृथ्‍वीकी परिक्रमा पूरी करनेकी इच्छासे उत्तर दिशाकी ओर यात्रा की ॥ ४५-४६ ॥

इति श्रीमहाभारते महाप्रस्थानिके पर्वणि प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत महाप्रस्थानिकपर्वमें पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मनको संयममें रखकर उत्तर दिशाका आश्रय लेनेवाले योगयुक्त पाण्डवोंने मार्गमें महापर्वत हिमालयका दर्शन किया ॥ १ ॥

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द्वितीयोऽध्यायः

मार्गमें द्रौपदी, सहदेव, नकुल, अर्जुन और भीमसेनका गिरना तथा युधिष्ठिरद्वारा प्रत्येकके गिरनेका कारण बताया जाना

वैशम्पायन उवाच

ततस्ते नियतात्मान उदीचीं दिशमास्थिताः ।
ददृशुर्योगयुक्ताश्च हिमवन्तं महागिरिम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मनको संयममें रखकर उत्तर दिशाका आश्रय लेनेवाले योगयुक्त पाण्डवोंने मार्गमें महापर्वत हिमालयका दर्शन किया ॥ १ ॥

तं चाप्यतिक्रमन्तस्ते ददृशुर्वालुकार्णवम् ।
अवैक्षन्त महाशैलं मेरुं शिखरिणां वरम् ॥ २ ॥
उसे भी लाँघकर जब वे आगे बढ़े तब उन्हें बालूका समुद्र दिखायी दिया। साथ ही उन्होंने पर्वतोंमें श्रेष्ठ महागिरि मेरुका दर्शन किया ॥ २ ॥

तेषां तु गच्छतां शीघ्रं सर्वेषां योगधर्मिणाम् ।
याज्ञसेनी भ्रष्टयोगा निपपात महीतले ॥ ३ ॥
सब पाण्डव योगधर्ममें स्थित हो बड़ी शीघ्रतासे चल रहे थे। उनमेंसे द्रुपदकुमारी कृष्णाका मन योगसे विचलित हो गया; अतः वह लड़खड़ाकर पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ३ ॥