भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2512, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2512

मुझे मालूम हुआ कि महात्मा कर्ण मेरे ही भाई थे। तबसे मुझे उनके लिये बड़ा दुःख होता है॥

इदं च परितप्यामि पुनः पुनरहं सुराः । यन्मातुः सदृशौ पादौ तस्याहममितात्मनः ॥ ७ ॥ दृष्ट्वैव तौ नानुगतः कर्णं परबलार्दनम् । न ह्यस्मान् कर्णसहितान् जयेच्छक्रोऽपि संयुगे ॥ ८ ॥

देवताओ! यह सोचकर तो मैं और भी पश्चात्ताप करता रहता हूँ कि ‘महामना कर्णके दोनों चरणोंको माता कुन्तीके चरणोंके समान देखकर भी मैं क्यों नहीं शत्रुदलमर्दन कर्णका अनुगामी हो गया?’ यदि कर्ण हमारे साथ होते तो हमें इन्द्र भी युद्धमें परास्त नहीं कर सकते ॥ ७-८ ॥

तमहं यत्र तत्रस्थं द्रष्टुमिच्छामि सूर्यजम् । अविज्ञातो मया योऽसौ घातितः सव्यसाचिना ॥ ९ ॥

ये सूर्यनन्दन कर्ण जहाँ कहीं भी हों मैं उनका दर्शन करना चाहता हूँ; जिन्हें न जाननेके कारण मैंने अर्जुनद्वारा उनका वध करवा दिया ॥ ९ ॥

भीमं च भीमविक्रान्तं प्राणेभ्योऽपि प्रियं मम । अर्जुनं चेन्द्रसंकाशं यमौ चैव यमोपमौ ॥ १० ॥ द्रष्टुमिच्छामि तां चाहं पाञ्चालीं धर्मचारिणीम् । न चेह स्थातुमिच्छामि सत्यमेवं ब्रवीमि वः ॥ ११ ॥

मैं अपने प्राणोंसे भी प्रियतम भयंकर पराक्रमी भाई भीमसेनको, इन्द्रतुल्य तेजस्वी अर्जुनको, यमराजके समान अजेय नकुल-सहदेवको तथा धर्मपरायणा देवी द्रौपदीको भी देखना चाहता हूँ। यहाँ रहनेकी मेरी तनिक भी इच्छा नहीं है। मैं आप लोगोंसे यह सच्ची बात कहता हूँ ॥ १०-११ ॥

किं मे भ्रातृविहीनस्य स्वर्गेण सुरसत्तमाः । यत्र ते मम स स्वर्गो नायं स्वर्गो मतो मम ॥ १२ ॥

सुरश्रेष्ठगण! अपने भाइयोंसे अलग रहकर इस स्वर्गसे भी मुझे क्या लेना है? जहाँ मेरे भाई हैं वहीं मेरा स्वर्ग है। उनके बिना मैं इस लोकको स्वर्ग नहीं मानता ॥ १२ ॥

देवा ऊचुः

यदि वै तत्र ते श्रद्धा गम्यतां पुत्र मा चिरम् । प्रिये हि तव वर्तामो देवराजस्य शासनात् ॥ १३ ॥

देवता बोले—वत्स! यदि उन लोगोंमें तुम्हारी श्रद्धा है तो चलो, विलम्ब न करो। हम लोग देवराजकी आज्ञासे सर्वथा तुम्हारा प्रिय करना चाहते हैं ॥ १३ ॥

वैशम्पायन उवाच